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रथ प्रथ्वी रवि शशि पहिये, सर गंगा का ताज,

ब्रह्मा बने सारथी, धनु सुमेरु नागराज !

चक्रपाणि विष्णू रूपी तब वाण चढ़ाया,

खेल खेल में त्रिपुरासुर यमधाम पठाया !

जिस सुरगंगा बौछार व्योम के तारा गण है,

शीश जटा पर सोहे ज्यूं जलविन्दु कण है !

वही विन्दु बन सिन्धु जगत को तारे,

हैं विराट जगदीश्वर भोले शम्भू हमारे !!

जिसके वाण प्रभाव देव नर असुर बचे ना !

भस्म हुआ बह काम, कि शिव को अहम रुचे ना !!

दे अर्ध अंग निज हिम तनया को ओढरदानी !

आधीन भक्ती के एक रूप हुए शम्भू भवानी !!

काल जयी ओ काम जयी, मन वाणी पहुँच परे हो !

शारद, ब्रह्म अगम्य भले, कर निज जन शीश धरे हो !!

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