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दिनांक ११-१०-८३, नवरात्री के पावन अवसर पर अपने दो मित्रों श्री गोपाल कृष्ण डंडोतिया तथा श्री गोकुल दुबे के साथ जगन्नाथ पुरी जाने का कार्यक्रम बना | सभी ३०-३२ वर्ष की आयु वर्ग के थे, अतः बिना रिजर्वेशन कराये झाँसी से जगन्नाथ पुरी जाना तय किया रात्रि एक बजे कलिंग एक्सप्रेस पकड़कर हम लोग धकापेल मैं उठते गिरते जैसे तैसे चित्रकूट तक आये | परेशान होकर विचार बना कि रास्ते में सतना के नजदीक मैहर माता का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है अतः उनके दर्शन का लाभ भी ले लिया जाये | एक छोटे से खोखे मैं स्नान शौच आदि की रस्म अदायगी कर ११ रु. का प्रसाद लेकर हम बढ़ चले ५६० सीढीयों की ओर मैहर की शारदा मां का दर्शन करने | ऊपर पहुंचते पहुंचते दो बार बैठना पड़ा | ऊपर भीड़ गणना तीत | व्यबस्था नाम की कोइ चीज ही नहीं | पुलिस जो व्यबस्था कर रही थी, उससे व्यवस्था की जगह अव्यवस्था ज्यादा हो रही थी | आपा धापी का फायदा उठाकर मेरे दोनों मित्र मंदिर प्रवेश करने में सफल हो गए | किन्तु मेरा दुर्भाग्य , मुझे कोइ अवसर नहीं मिला | यहाँ तक की मैं स्वयं को खड़ा रहने में भी असमर्थ अनुभव करने लगा | मन में जगज्जननी का स्मरण कर कहने लगा माँ जैसा भी हूँ आपका हूँ | दर्शन दो माँ | मन ही मन एक संकल्प लिया कि १०० तक गिनूंगा, माँ की कृपा होगी, दर्शन देने होंगे तो कुछ व्यवस्था होगी अन्यथा वापस लौट जाऊंगा | मैंने १०० तक गिनती पूरी की ही थी कि गोकुल जी की आवाज आई | पंडित जी बाहर आ जाओ | मैंने सोचा कि शायद माँ की इच्छा दर्शन देने की नहीं है, किन्तु एसा न था , गोकुल जी मुझे अंदर जाने की ट्रिक बताने आये थे | मंदिर के पीछे विशिष्ट व्यक्तियों के लिये दर्शनों की व्यबस्था थी | बैक डोर एंट्री | आम लोगों को तो पुलिस के डंडे ही मिल रहे थे | पर माँ की कृपा, मैं बेरोकटोक उसी द्वार से प्रवेश पा गया | भाव विभोर होकर मैंने माँ शारदा के दर्शन किये | इश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन न सही , मुझ जैसे धर्म कर्म विहीन व्यक्ति को भी माँ ने अपनी अनुभूति कराई |

लौटकर मैहर बस स्टैंड पर भोजन किया | होटल सरला सस्ता व् अच्छा भोजन | ८ रु.७०. पैसे में तीनों का भोजन हो गया | मैहर से कटनी की यात्रा भी उतनी ही कष्टप्रद रही | बैसे ही तो थके मांदे ऊपर से खचा खच भरी बस में एक पैर पर खड़े खड़े | कटनी मैं रात्री विश्राम एक होटल में कर रात ३ बजे उत्कल एक्सप्रेस से पुरी को रवाना हुए | बिना रिजर्वेशन के बिलासपुर तक उठते बैठते आये, आखिरकार बिलासपुर मैं सीट मिली , पर मालूम हुआ गोपाल जी बुखार की चपेट मैं आ गए हैं| उन्हें दरी बिछाकर ऊपर की सीट पर सुला दिया | ट्रेन राऊरकेला पहुंची | गोकुल जी ने ४ पुडी व् सब्जी प्लेटफार्म से खरीद कर मुझे देदी | मैं खिड़की के पास बाली सीट पर बैठकर उन्हें उदरस्थ करने लगा | तभी बाहर से एक छोटा सा ४-५ साल का बच्चा आकर ५ पैसे देने की मांग करने लगा | मैं उसे नजर अंदाज कर खाने में लगा रहा | मैंने जैसे ही अंतिम कौर ख़त्म किया , बच्चा रोकर बोला "एक पूड़ी भी नहीं दे सकते थे " और एक ओर को चला गया | मैं धीरे सा बुदबुदाया, "बेटा तू तो पैसे मांग रहा था" , पर अन्दर ही अन्दर मुझे आत्मग्लानी हुई | अपने आप पर शर्म आई | बच्चे को इस प्रकार दुखी नहीं करना चाहिए था |
 
तभी ऊपर की बर्थ पर बुखार में तपते गोपाल जी ने पानी की मांग की | मैं लुंगी बनियान में ही एक गिलास लेकर नल से पानी भरने प्लेटफार्म पर उतरा | गिलास भरा ही था कि सीटी देकर गाड़ी चल दी | मैं जल्दी से भागकर सामने वाले डिब्बे में जा चढ़ा | ऊपर की साँस ऊपर नीचे की नीचे रह गई | मैं अपने डिब्बे के स्थान पर जनरल डिब्बे में चढ़ गया था , जिसमें धुर बंगाल और बिहार के भिखारी भरे हुए थे , किसी के हाथ में अल्युमीनियम का कटोरा तो किसी के पास कोई और गन्दा सा पात्र | हाथ में पानी का गिलास थामे , लुंगी बनीयान में मैं भी उनका ही भाई बिरादरी लग रहा था | डिब्बे मैं बैठने को सीट नहीं थी, केवल फ़र्स था जिस पर लोग उकडू या सुखासन में बैठे थे | पूरा डिब्बा मछली और चावल की गंध से भरा हुआ था | तुरंत बिजली सी कोंध उठी " उस छोटे बच्चे के रूप में जगन्नाथ का दिल दुखाने का जो पाप हुआ, उसके परिणाम स्वरुप मुझे इश्वर ने तुरंत ही भिखारी जीवन का अनुभव करा दिया "| मन का आवेग कम हो गया | उस नरक में भी स्वर्ग दिखने लगा | प्रभु की कृपा महसूस हुई | इतनी जल्दी कर्म फल प्राप्ति की अनुभूति ने इश्वराराधन में तल्लीन कर दिया | पर यह क्या ? गाड़ी तो हर आधा पोन घंटे में कहीं न कहीं रुकती ही थी , पर इस बार मुझ अधम को दंड देने के लिए कहीं रुक ही नहीं रहीं | मैं कहीं भी बस्ती का चिन्ह देखते ही आशा करता कि शायद अब गाड़ी रुकेगी और मैं अपने डिब्बे में पहुँच सकूँगा ,पर गाड़ी थी की व्हिसिल देती स्टेशन पर स्टेशन छोड़ती चली जा रही थी |

मैं कभी देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र " कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवती" का जाप कर भगवती का स्मरण करता तो कभी " तुम तो शिवजी सदा दयामय अवगुण मोरे सब ढकीयो , मम अपराध क्षमा कर शंकर, किंकर की विनती सुनियो ", मन ही मन गुनगुनाता | मन में विचार आया कि क्या प्रभु की कृपा से लाइन क्लियर न मिलने के कारण आउटर पर गाड़ी नहीं रुक सकती, ताकि मैं अपने डिब्बे में पहुँच सकूं | मेरा एसा सोचना था कि आश्चर्य, चमत्कार हुआ और गाड़ी बीच जंगल में खड़ी हो गई | मैंने डिब्बे के नीचे झाँका तो पैर रखने की भी जगह नहीं दिखी | झाडियाँ ही झाडियाँ साथ में अँधेरा | ड़र लगा कि कहीं मैं नीचे उतरा और गाड़ी चल दी | अगर इस अर्ध नग्न स्थिति में जंगल में ही छूट गया तो क्या होगा | बचपन में पढ़े हुए टार्जन की तस्वीर दिमाग में उभरी और मैं बेसाख्ता हंस पड़ा | आसपास बैठे हुए भिखारी मुझे कौतुहल से देखने लगे | 

गाड़ी चली तो मुझे फिर प्रभु याद आये | सोचा जिन्होंने मेरी फ़रियाद पर गाड़ी रोक दी वे क्या मेरे डिब्बे में पहुँचने की चिंता नहीं करते | मुझे लगा कि मैं एक बार फिर फेल हो गया | पर इस फेल होने में एक अनिर्वचनीय आनंद था | प्रभु कृपा की अनुभूति ने आनंद विभोर कर दिया था | मन पूरी तरह शांत हो चुका था |
भाषा न जानने के बाद भी मैं आसपास के लोगों से कुछ तो भी वार्तालाप करने लगा | वे भी खुश दिखे | मैं पिछले तीन घंटे से खड़ा ही था| हाथ में पानी का भरा गिलास लिए | न तो यह होश था कि मैं उस पानी को पी लूं या फेंक ही दूं | पगला सा गया था | अब इस ओर ध्यान गया तो फिर होठों पर मुस्कान आ गई | मैंने वह पानी पी लिया | गाड़ी आखिरकार चक्रधरपुर स्टेशन पर रुकी और मैं अपने चिंताकुल मित्रों तक पहुंचा | वे लोग भी भगवान से मेरी सलामती की प्रार्थना कर रहे थे | इस यात्रा में प्रभु जगन्नाथ ने मंदिर पहुँचने से पूर्व ही मुझ जैसे अकिंचन को मार्ग में ही दर्शन दिए मेरी तो यही अनुभूति है | आप क्या महसूस करते हैं ?

आज सोचकर हैरत होती है
 
मैहर का होटल सरला ८ रु.७०. पैसे में तीनों का भोजन हो गया

जगन्नाथ पुरी का अशोक लोज ! २५ रु. दैनिक पर तीन लोगों को कमरा बिस्तर सहित !!

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