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विवेकानंद जी का बड़ा कार्य क्या, पूछे जाने पर आम तौर पर उनके शिकागो व्याख्यान और वहां के अमेरिकन सिस्टर्स एंड ब्रदर्स वाले संबोधन की ही चर्चा होती है | किन्तु उनके महत्व का आंकलन करने के लिए हमें उनके जन्म काल की परिस्थित की कल्पना करनी होगी | उनका जन्म हुआ था ११ जनवरी १८६३ को अर्थात १८५७ के स्वातंत्र्य समर के मात्र ६ वर्ष बाद | १८५७ के स्वातंत्र समर की असफलता के बाद अंग्रेजों द्वारा भीषण दमन चक्र चलाया गया | कई स्थानों को पूर्णतः विजन कर दिया गया अर्थात वहां ६ वर्ष की आयु से लेकर ६० वर्ष तक के लोगों को निर्दयता पूर्वक मार डाला गया | इसके कारण भयभीत समाज में अत्यधिक शरणागति का भाव आ गया था | उस समय के सामाजिक कार्यकर्ता राजा राममोहन राय, न्यायमूर्ति रानाडे जैसे लोग भी अंग्रेजों के गुणगान करने लगे थे | श्री गोपाल कृष्ण गोखले के गुरू श्री रानाडे ने तो सन १९०० में लाहौर में यहाँ तक कहा कि सन्यासी धर्म भारत की विकृति है | ऐसे वातावरण में स्वामीजी का जन्म हुआ |

स्वामी विवेकानद की केवल ३९ वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई | स्वामी जी ने कोई संगठन खडा नहीं किया, किन्तु उनके सतत प्रवास ने समाज में आत्मविश्वास पैदा किया और उनकी मृत्यु के तीन वर्षों के अन्दर अंग्रेजों को कलकत्ता से अपनी राजधानी हटाकर दिल्ली लाना पड़ा | अंग्रेज राज्य मुश्किल हो गया | उस समय एकमात्र सफल आन्दोलन बंग भंग विरोधी हुआ जिसमें अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े और निर्णय वापस लेना पडा | इस घटनाचक्र में स्वामी जी के जाग्रति अभियान का बहुत बड़ा योगदान रहा |

१८९१ के शिकागो वक्तृता के बाद तो विवेकानंद जी सर्वमान्य हुए किन्तु उसके पूर्व ही उन्होंने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया | अपने गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस जी का सन्देश जन जन तक पहुंचाने कि मातृभूमि को पूजो | अल्मोड़ा में बद्रीसहाय बटुकधारी ने पूछा कि आप देशभक्ति की बात करते हो, किन्तु उसका उल्लेख वेद उपनिषद् में कहाँ है ? स्वामी जी ने भारत भक्ति का वर्णन करतीं उपनिषदों की ऋचाएं उन्हें सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया | स्वामी जी की प्रेरणा के पश्चात उन्होंने उपनिषदों का अध्ययन करने के लिए संस्कृत सीखी और सुप्रसिद्ध “वैशिक शास्त्र” पुस्तक लिखी | उस पुस्तक का अध्ययन स्व. दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी किया | उनके द्वारा प्रतिपादित चिति और विराट की संकल्पना वह पुस्तक ही थी | दक्षिण के सुप्रसिद्ध कवि श्री सुब्रह्मण्यम भारती जी की प्रारंभिक कविताओं में तमिल राष्ट्रवाद का उल्लेख मिलता है, किन्तु स्वामी जी के प्रभाव में आने के बाद उनकी जीवन के उत्तरार्ध में लिखी कवितायें भारतीय हिन्दू राष्ट्रवाद का गुणगान करती हैं | उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि यह परिवर्तन उनकी गुरू भगिनी निवेदिता और स्वामीजी के कारण उत्पन्न हुआ | देशभक्ति से ओतप्रोत स्वामीजी के भाषणों द्वारा पैदा की गई विचारों की चिंगारी का असर वीर सावरकर तथा लोकमान्य वाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रभक्तों पर भी दिखाई देता है | सावरकर जी ने तो संघर्ष कर अंडमान जेल में भी जो लाईब्रेरी बनवाई उसमें विवेकानंद साहित्य रखवाया | अपने वृहत काव्य सप्तर्षि में सावरकर जी ने लिखा कि निराशा के क्षणों में उन्हें विवेकानंद के विचार ही प्रेरणा देते थे | १९०१ में बेल्लूर में हुए कांग्रेस अधिवेशन के समय तिलक जी लगातार आठ दिन तक विवेकानंद जी से नियमित मिलते रहे | तिलक जी के लेखों में उसके बाद ही दरिद्र नारायण शब्द का प्रयोग प्रारम्भ हुआ | अंग्रेजों द्वारा बनाए गए सिडीशन कमीशन की रिपोर्ट में इस भेंट का उल्लेख है | कमीशन ने इसे हिन्दू पुनर्जागरण की साजिश करार दिया |

रामकृष्ण मठ के स्वामी ब्रह्मानंद जी से प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासविहारी बोस की नजदीकी थी | मठों से अनेक क्रांतिकारी गिरफ्तार भी हुए | सुप्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय है, तो वह है विवेकानंद | फिर चाहे वो आन्दोलन अहिंसात्मक हो अथवा क्रांतिकारी | महर्षि अरविन्द को क्रान्ति व योग की प्रेरणा देने वाले भी विवेकानंद जी ही थे | अनुशीलन समिति के सभी क्रांतिकारी, लाहिड़ी, सान्याल, लाला हरदयाल, चन्द्र शेखर आजाद आदि सभी अपने पास विवेकानंद साहित्य रखते थे | अंग्रेज इन सब बातों को संदेह की नजर से देख रहे थे | उन्होंने स्वामीजी के भाषणों की जांच भी करवाई किन्तु यह स्वामीजी की चतुरता व कुशलता थी कि अंग्रेज एक शब्द भी आपत्तिजनक न पा सके |

तिलक जी को स्वदेशी का विचार तथा गीता भाष्य की प्रेरणा देने वाले भी विवेकानंद जी थे | हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रणेता राजनारायण बोस के साथ स्वामीजी वर्धमान में सात दिन रहे | वह व्यक्ति इतने शुद्ध थे कि किसी अंग्रेजी जानने वाले व्यक्ति से बात भी नहीं करते थे, किन्तु स्वामीजी अपना अंग्रेजी ज्ञान छुपाकर उनके साथ रहे | नवजीवन प्रकाशन कलकत्ता से प्रकाशित भूपेन्द्र नाथ दत्त की पुस्तक “पेट्रिओट प्रॉफिट स्वामी विवेकानंद” में उल्लेख है कि अपनी फ्रांसीसी शिष्या जोसेफाईन मोक्लियान से स्वामी जी ने कहा कि क्या निवेदिता जानती नहीं है कि मैंने स्वतंत्रता के लिए प्रयास किया, किन्तु देश अभी तैयार नहीं है, इसलिए छोड़ दिया | देश भ्रमण के दौरान पूरे देश के राजाओं को जोड़ने का प्रयत्न संभवतः स्वामी जी ने किया होगा, जिसका संकेत उक्त चर्चा में मिलता है | स्वामी जी ने आत्मग्लानि में धंसे भारतीय समाज को बाहर निकाला | उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुझे गर्व हैकि मैं ऐसे धर्म में पैदा हुआ हूँ जिसने सदियों से दुनिया को राह दिखाई | चेतना हीन समाज को चैतन्य करना उनका सबसे बड़ा योगदान |

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