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आपको स्मरण होगा देश के प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है | सुप्रीम कोर्ट द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण हेतु बनाए गए साढ़े चार प्रतिशत के उपकोटे को निरस्त करने के बाद अभी हाल ही में एक केन्द्रीय नेता ने बयान दिया कि वे अटार्नी जनरल से बात कर इस मसले को हल करने का प्रयत्न कर रहे हैं | किन्तु तब तक चवालीस पोलिटेक्निक और एकसौतेरह आईटीआई अल्प संख्यक केन्द्रित इलाकों में खोले जा रहे हैं | इतना ही नहीं तो सभी अकादमिक चयन समितियों में अल्पसंख्यक प्रतिनिधि नियुक्त होंगे | स्वाभाविक ही इन प्रतिनिधियों का एकसूत्रीय एजेंडा चयन में अघोषित रूप से अल्पसंख्यकों को वरीयता देना ही होगा |

उनके आत्मविश्वास और अंदाज से स्पष्ट है कि सरकार अल्पसंख्यक आरक्षण को लागू करने की हर संभव चेष्टा करेगी | यह अभियान देश और समाज के लिए अत्यंत खतरनाक और विघटनकारी है | सर्वाधिक खतरनाक तथ्य यह हैकि आज के हालात में अल्पसंख्यक का अर्थ मात्र एक समुदाय विशेष मान लिया गया है | इसका कारण यह भी है कि संविधान में अल्पसंख्यक की कोई सीधी परिभाषा नहीं की गई है | एक ओर तो संविधान की धारा २९ के अनुसार मजहब, जाति, नस्ल और भाषा के आधार पर अल्पसंख्यकों का निर्धारण होना चाहिए, बहीं दूसरी ओर धारा ३० में इसके लिए भाषा और मजहब को मान्य करने का उल्लेख है | संविधान में वहुसंख्यक कौन, इस प्रश्न को सिरे से छोड़ दिया गया है | इस खामी का लाभ उठाकर ही यह मनमानी अन्धेरगर्दी और लूटपाट चल रही है |

यदि भारत के सन्दर्भ में विचार करें तो विविधता पूर्ण यहाँ की समाज रचना में तथाकथित अल्पसंख्यक ही प्रमुख बहुसंख्यक है | यदि संविधान की धारा २९ के अनुसार विचार करें तो उसमें उल्लेखित जाति के मापदंड पर तो ब्राह्मण भी अल्पसंख्यक होंगे | अलग अलग जिलों और राज्यों में अलग अलग जातियां अल्पसंख्यक होंगी व इस प्रकार प्रत्येक जाति कहीं न कहीं अल्पसंख्यक दिखाई देगी | धारा ३० के अनुसार देखें तो प्रत्येक राज्य में कोई न कोई भाषा भाषी अल्प संख्यक दिखाई देगा | यहाँ तक कि तीन चौथाई राज्यों में हिन्दी भाषी भी अल्प संख्यक हैं | इन बेचारे अल्पसंख्यकों के लिए कब कब क्या क्या किया गया ?

वास्तविकता सब जानते हैं किन्तु अल्पसंख्यक कहे जाने बाले दबंग बहुसंख्यकों के सामने दबे कुचले उपेक्षित निर्बल वर्ग की खोज खबर लेने की हिम्मत किसी में नहीं है | यह अल्पसंख्यकवाद देश विभाजक राजनीति का हथकंडा बनकर रह गया है | वोट बेंक के लालची हिन्दू शब्द के आधार पर बहुसंख्यक का निर्धारण करते हैं, किन्तु व्यवहारिक धरातल पर भारत का कोई भी व्यक्ति केवल जाति से पहचाना जाता है | इस प्रकार जातियों में विभाजित हिन्दू समाज स्वयं अनेक अल्पसंख्यक समूहों में विभाजित है | प्रत्येक जाति दूसरे से अलग होने का दावा करती है, अतः इनमें से किसी को भी बहुसंख्यक नहीं कहा जा सकता | हिन्दुओं में सभी अल्पसंख्यक हैं |

अपने पूर्वोक्त निर्णय में १९४७ का उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने लिखा है कि अंग्रेजों द्वारा धार्मिक आधार पर किसी को अल्पसंख्यक मानने और अलग निर्वाचक मंडल बनाने आदि कदमों से ही अंततः देश के टुकडे हुए | न्यायाधीशों ने यह भी लिखा कि अगर मात्र भिन्न धार्मिक विश्वास या कम संख्या या कम मजबूती, धन-शिक्षा-शक्ति या सामजिक अधिकारों के आधार पर भारतीय समाज के किसी समूह के अल्प संख्यक होने का दावा स्वीकार किया जाता है तो भारत जैसे बहुधार्मिक, बहुभाषाई समाज में इसका कोई अंत नहीं रहेगा | - २७ जून २०१३ को जनसत्ता में प्रकाशित श्री शंकर शरण के लेख के आधार पर साभार

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