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बाहर चपला चमके चम् चम्
मन में घन आकर जाते थम
विरह व्यथा की कथा है अकथ
क्यूं किससे कहने जाएँ हम ?
यादों के मेघ मल्हारों में
मन की वीणा के तारों में
वह करुण राग ठिठका सा है
वर्षाकालीन सितारों में |
मेरे इन शुभ्र अयालों में
धूमिल होते से खयालों में
बासंती रंग स्वप्न सा है
जीवन उलझा है सवालों में |
यह नहीं उदासी की भाषा
मैं तो हूँ मूर्तिमंत आशा
जीवन की रात बीतने को,
अब नींद आये यह अभिलाषा |
फिर सूर्य किरण मुस्कायेगी
फिर से बुलबुल कुछ गायेगी 
फिर नई डगर पर नई वधु
अलबेली पनघट जायेगी ||

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