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दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडीटर श्री कल्पेश याज्ञिक ने इशरत जहां के सम्बन्ध में कुछ जानकारियों आज दिनांक 6 जुलाई २०१३ के दैनिक भास्कर भोपाल के प्रष्ठ क्रमांक 18 पर प्रस्तुत की हैं, जिसके अनुसार 19 वर्षीय इशरत के पिता 2002 में गुजर गए | उसके बाद माँ और सात भाई बहिनों वाले परिवार को चलाने की जिम्मेदारी उसके ही कन्धों पर आई | इसी दौरान उसे जावेद शेख ने नौकरी दी | जावेद शेख मूलतः केरल के पिल्लई परिवार में पैदा हुआ प्राणेश पिल्लई था, तथा उसने पुणे की साजिदा शेख से विवाह के लिए इस्लाम कबूल किया था | यह जावेद नकली नोटों का तस्कर था, यह स्थापित तथ्य है | इसी जावेद के साथ इशरत जहाँ कश्मीर भी गई थी जहाँ इनके साथ पाकिस्तानी आतंकी जीशान जौहर और अजमल अली राणा भी थे | इन लोगों के खुफिया मेसेज सुने गए, इनके पास सेटेलाईट फोन भी बरामद हुआ |
इशरत को जावेद ने क्या नौकरी दी थी ?
इशरत कौन सा काम करती थी, जिसके लिए उसे इतना सफ़र करना पड़ता था ?
15 जून 2004 को वो जावेद के साथ क्या करने गई थी ?
और सबसे अहम् सवाल कि इशरत जहां का परिवार मर्सडीज कार जैसी महंगी गाडी को कैसे मेन्टेन कर रहा है ? इसके लिए उनके पास धन कहाँ से आ रहा है ?
खुद आई बी के सामने कुख्यात आतंकी हेडली ने स्वीकार किया कि इशरत जहां आत्मघाती हमलावर थी, उस बयान का क्या ?

जब अदालत में इशरत का केस लड़ने वाली बकील वृंदा ग्रोवर से ये सवाल किये जाते हैं, तो वे हत्थे से उखड जाती हैं | वे भले इन बातों का कोई जबाब ना दें, किन्तु देश इन सवालों का जबाब जानना चाहता है | यदि इशरत जहां मासूम नहीं थी, तो फिर उसकी मौत पर इतना बबाल क्यों ? क्यों बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार उसे गौरव के साथ बिहार की बेटी घोषित कर रहे हैं ? ऐसी बेटियों पर फक्र होना चाहिए या शर्मिन्दगी ?
इशरत जहां के परिवार के पास इतना पैसा कहाँ से आ रहा है जो वो मर्सडीज जैसी मेहगी गाड़ियों को मेन्टेन कर सकते हैंजबकि उसकी पारिवारिक हैसियत ऐसी थी ही नहीं | उसके दादा पटना से सटे खगौल में रहते थे तो नाना आलमगंज थाना में। इशरत के मामा पटना एआइटी में काम करते हैं । इशरत जहां ने बिहार के मुंगेर में बचपन बिताया था। वह क्लास दो तक मुंगेर के जमालपुर में संत राबर्ट स्कूल में पढ़ी थी। इशरत के पिता शमीम रजा ने पटना में बैग का कारोबार किया था। धंधा नहीं चला तो मुंबई चले गये। शमीम रजा के पिता यानी इशरत के दादा वली मोहम्मद उर्फ नन्हू मियां खगौल में रहते थे। उनका छोटा सा कारोबार था। वह यहां किराए के मकान में रहे। इशरत के नाना अब्दुल मजीद जमालपुर रेलवे कारखाने में कर्मचारी थे।
अतः यह आवश्यक है कि इस बात की जांच होना ही चाहिए कि इशरत के परिवार को कौन कौन लोग फंडिंग कर रहे थे ? और कौन कौन लोग अब भी फंडिंग कर रहे है ? इंटेलीजेंस एजेंसियां इस बात को जानती है कि जब आतंकवादी संगठन किसी को अपने साथ मिलाते है तो उसके परिवार के खर्चे की भी ब्यवस्था करते है ताकि संगठन में भर्ती हुए सदस्य के परिवार का आर्थिक भरण पोषण होने में कोई समस्या ना रहे और भर्ती हुआ सदस्य बिना किसी आर्थिक चिंता के आतंकी संघठन की कारगुजारियों को अंजाम देता रहे | इतनी सारी बातों को देख कर क्या कोई ये अंदाजा नही लगा सकता कि दाल में कुछ काला है या काले में दाल इतना को कोई भी अंदाजा लगा सकता हैकि कहीं तो कुछ ना कुछ गडबड है ही | इशरत के परिवार की वर्तमान आर्थिक स्थिति और इशरत की कमाई के तथ्यों की जांच इंटेलीजेंस ब्यूरो की देखरेख में SIT बनाकर होनी चाहिए तथा इस SIT का गठन सुप्रीम कोर्ट के कम से कम तीन पूर्व जजो की देख रेख में होना चाहिए. ताकि सच सामने आ सके | वर्ना आतंकवादियों को मुस्लिम वोटो के सौदागर कुछ राजनैतिक दल इसी प्रकार महिमा मंडित करते रहेंगे |

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