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सूक्ष्म ओ चंचल, चपल, गतिमान मन मेरे !
जो सूक्ष्म जग में सर्व व्यापी, रूप में रम रे !!
खोलदे सब गाँठ मन की, हो अहम का अंत !
ले परम रस भक्ति का, दे सोंप खुद निश्चिन्त !!
भक्ति में यदि शर्त है तो, गर्त जाना तय !
यह अनन्या भक्ति पावन, गह बने प्रभुमय !!
देव लो अपनी शरण में, दूर हों सब फेर !
पाप ओ फिर पुण्य वन्धन, हरण में क्यूं देर !!
मांगता हूँ कर पसारे, निष्कामना की चाह !
मांगना भी कर्म है पर, परम सत्य की राह !!
लोभ भय ओ क्रोध ममता, अहम भी जो है गरजता !
कर्म वन्धन जाल मकडी, प्रभु शरण से दूर करता !!
दिव्यता प्रभु की जो देखी, मन हुआ निर्मल सुपावन !
बस कृपा की याचना कर, जब गहा उसका ही दामन !!
गर्भ में पोषण से लेकर, आज तक उसने किया है !
वह सदा करुणा का सागर, बिन कहे सब कुछ दिया है !!
मृग तृषा भौतिक सुखों की, जगत की ममता है वन्धन !
कर्म पूजा अब बने, भव सिन्धु भंवरों से बचे मन !!
कर्म जो करता हूँ मैं, सब शम्भू की आराधना हो !
भक्ति हो निखरी खरी, मन में यही बस कामना हो !!

"यद्याद्य कर्म करोमि, तद्धित्वम शम्भो तवाराधनम"

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