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कजरारी घटा और,
कोंधती बिद्युत को देखा
मन में उपजी सहज,
विचारों की रेखा !
सुना भय की चरम सीमा ही,
साहस की परिभाषा है !
द्रढता ओ विश्वास में छुपी,
क्रियाशीलता आशा है !
जैसे काले बादलों में ही
कोंधती बिजली !
विपरीत स्थितियों में उपजी,
महानता उजली !
राम से अधिक कष्ट
कौन उठा सकता है ?
कृष्ण कंस का कथासार
भी तो यही कहता है !
कृष्ण को बचपन से ही
कंस ने मारना चाहा !
जब छल न चला तो मथुरा में,
बल से कुचलना चाहा !
विपरीत परिस्थितियों को
जो मोड़ देते है !
वही इतिहास में अपने
चिन्ह छोड़ देते हैं !
आज मेरे देश में भी तो
भय का घटाटोप अँधेरा है !
कहीं न दिखती राह,
आस्था का संकट घनेरा है !
कभी भ्रष्टाचार का बोझ,
तो कभी महंगाई ढोना !
कभी आतंकियों का शोर,
कभी जयचंद देख रोना !
न कोई नेता न कोई तंत्र,
अराजकता का बसेरा है !
क्या सच इस भय में छुपा,
कोई सुनहरा सबेरा है ???

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