Google+ Badge




 होशंगावाद, नर्मदा के किनारे बसा एक धार्मिक नगर | यहाँ 2001 में एक ट्रेन की चपेट में आकर श्री आशीष चटर्जी ने अपना एक पैर खो दिया | दूसरा पैर भी काफी कुछ क्षतिग्रस्त हो गया, जिसका इलाज भी तीन वर्ष चला | आजीविका हेतु उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को चुना | बैसे भी होशंगावाद शहर एक शिक्षा केंद्र के रूप में उभरता जा रहा था | 2002 में उन्होंने एक विद्यालय प्रारम्भ किया | इस विद्यालय को उन्होंने केवल प्राथमिक विद्यालय रखना तय किया | उसमें आज 250 बच्चे अध्ययन कर रहे हैं | 2006 में एक दूसरा विद्यालय प्रारम्भ किया जिसे उन्होंने नर्सरी कक्षा से कक्षा दस तक रखा है, उसमें आज लगभग 450 बच्चे अध्ययन रत हैं |
शिक्षा क्षेत्र में सफलता मिली, किन्तु मन में विचार आता रहा कि इतनी बड़ी ट्रेन दुर्घटना के बाद भी अगर ईश्वर ने जिन्दगी दी है, तो जरूर कुछ करने के लिये ही | इसी मानसिकता व विचार के चलते उन्होंने एक तीसरा विद्यालय “सहयोग विशेष आवासीय विद्यालय” द्रष्टिबाधित बच्चों के लिए खोलना तय किया | समस्या यह थी कि अंधत्व के चलते बच्चे रोज घर से विद्यालय तो आ नहीं सकते थे | अतः बालक बालिकाओं के लिए प्रथक प्रथक छात्रावास की भी व्यवस्था की | आज उस विद्यालय में कक्षा 1 से दसवीं तक के कुल 50 बच्चे हैं, जिनमें जन्मांध से लेकर 70 प्रतिशत तक अंधत्व के शिकार बच्चे हैं |
इस वर्ष कक्षा 12 में तीन बच्चे पहुंचे हैं | ब्रेल लिपि के माध्यम से इन्हें शिक्षण दिया जाता है | साथ साथ संगीत, खेलकूद, कंप्यूटर, व्यक्तित्व विकास एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण भी इन्हें प्रदान किया जाता है | यह श्रेष्ठ अध्यापन का ही कमाल है कि विद्यालय के बच्चे राज्य स्तरीय बालरंग प्रतियोगिता में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ साबित करते हुए चार प्रथम व तीन द्वितीय पुरस्कार जीते | राज्य स्तरीय शीतकालीन खेलों में भी बच्चों ने चार स्वर्ण, 3 रजत तथा 3 कांस्य पदक जीते | जिस प्रतियोगिता में भी विद्यालय के बच्चे भाग लेते हैं, उसमें सर्वाधिक पुरस्कार / पदक जीतने का गौरव इन्हें ही मिलता है | रतलाम में आयोजित सुगम संगीत प्रतियोगिता में भी यहाँ के विद्यार्थी ने ही प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया | यही कारण है कि बच्चों में आत्म विश्वास कूट कूट कर भरा है, वे मानते हैं कि वे किसी से कम नहीं हैं | इनको शिक्षण प्रशिक्षण देने वाले शिक्षक शिक्षिकायें इनके प्रति पूर्णतः समर्पित हैं | इन बच्चों का उत्कर्ष देखकर उन्हें प्रसन्नता तो होती ही है, इन विशेष बच्चों को जीवन समर में सफल बनाने का व्रत लेकर उसे ही उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य मान लिया है | सीमित संसाधन, सीमित क्षमता, सीमित अवसर, किन्तु असीमित जीवट और संकल्प पूर्ण इच्छाशक्ति |
संस्था के निदेशक श्री आशीष चटर्जी इसे दुनिया को यह बताने का अवसर मानते है कि निःशक्तता के कारण सफलता में कोई बाधा नहीं होती, बस आवश्यकता होती है उचित प्रशिक्षण की | निशक्तता अगर व्यक्ति की मानसिकता को निशक्त कर दे तो ही वह निशक्त होता है | विभिन्न प्रादेशिक और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित श्री आशीष चटर्जी निःशक्तता के क्षेत्र में नई तकनीक और अधो संरचना के विकास के साथ प्रत्येक निःशक्त बच्चे एवं वयस्क के रोजगार प्रशिक्षण एवं पुनर्वास को ही अपना ध्येय मानते हुए सरकारी कार्यों में भी अपना योगदान एवं जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं | वे कहते हैं कि अगर समाज साथ दे तो थोड़े से प्रशिक्षण से ही इन बच्चों को इतना आत्म निर्भर बनाया जा सकता है कि वे अपना जीवन ससम्मान बिता सकें | किन्तु समाज में इस विषय को लेकर जागरूकता का अभाव है |
संस्था में समय समय पर अनेक गणमान्य एवं लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तियों का आगमन होता रहता है | पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने यहाँ आकर बच्चों को संतूर सुनाया | अभिभूत पंडित जी ने बच्चों की प्रतिभा को देखते हुए उनके प्रशिक्षण हेतु आगे प्रयत्न करने का आश्वासन भी दिया | अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गुंदेचा बंधू भी यहाँ आकर बच्चों के समक्ष ध्रुपद गायन प्रस्तुत कर के गए | दिल्ली के निजामी बंधुओं का सूफी संगीत तथा प्रसिद्द भारती वन्धुओं का कबीर पंथी गायन यहाँ बच्चों ने सूना है |
पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अ.भा.सेवा प्रमुख श्री सुभाष राव जी हिरेमठ भी यहाँ आये थे | बाद में जब उन्होंने इस विद्यालय की जानकारी अपने बौद्धिक में स्थान स्थान पर दी तो खंडाला के श्री राजन एम पंडित ने 50000 रुपयों की आर्थिक सहायता यहाँ चेक द्वारा भेजी | विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक महानुभाव तथा शासकीय अधिकारी समय समय पर विद्यालय आकर बच्चों का उत्साह बर्धन करते रहते हैं | आस्था, विश्वास, समर्पण और लगन से चल रहा यह कार्य उन्नति के नित नए सोपान चढ़े, यह कौन नहीं चाहेगा ?

Advertisement

 
Top