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समझदार वह है जो पाकिस्तान को दुश्मन नहीं माने और यह सोचे कि वह पागल है तब भी उससे दोस्ती की जानी चाहिए।  इसलिए कि सब वहां पागल नहीं है। प्रधानमंत्री मिंया नवाज भले है, जरदारी भले है वहां के लोग भले है और फिर दोनों तरफ एक ही तो खून है। इसलिए उसके पागल सैनिकों ने यदि पांच भारतीय सैनिकों की हत्या की है तो उनका चुपचाप क्रियाकर्म कर डालो। भडकाने से नहीं बल्कि समझाने से बात बनेगी। पागल को बिजली के शॉक से नहीं बल्कि हम थेरेपी यानि संवाद से दुरूस्त करेंगे!
और जो शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत बताते है वेअल्ट्रा नेशनलिस्टहै। ऐसे अल्ट्रा नेशनलिस्टो से भारत को बचाया जाएं!
अब आप भी विचार करें कि क्या सही है और क्या गलत?

 कांग्रेस प्रवक्ता अजय माकन ने भाजपा से कहा कि वह क्या पांच सैनिकों की हत्या पर शोर कर रही है उसके राज में भी ऐसे ही जवान मरते थे। फिर अजय माकन ने याद दिलाया कि अप्रैल 2001 में बांग्लादेश की सीमा पर भारत के 16 जवानों की बांग्लादेशी फोर्स ने हत्या की थी। तब वाजपेयी सरकार ने क्या किया? क्यों चुप रहीएनडीए के राज में हर साल जम्मू-कश्मीर में औसतन 874 लोग मरते थे जबकि पिछले साल वहां सिर्फ 15 लोग मरे। अजय माकन के ये आंकड़े गलत नहीं हैं। पर उनके आंकड़ों से निकला लबोलुआब यह है कि हमारे जवान मरते हैं तो मरते हैं। क्यों हम उन पर इतना स्यापा करते हैं?
एनडीए के राज में भी भारत के जवान बांग्लादेश या पाकिस्तान के हाथों मारे जाते थे, अब भी मारे जाते हैं। पहले ज्यादा मरते थे अब कम मरते हैं। वाजपेयी सरकार ने कुछ नहीं किया तो मनमोहन सरकार क्या कर लेगी? भाजपाईयों ने बांग्लादेश जैसे दो कौड़ी के देश से तो बदला लिया नहीं और हल्ला मचा रहे हैं कि पाकिस्तान से बदला लो! भाजपा अपनी गिरेबां में झांक कर देखे। हंगामा नहीं करे।
अब इस सब पर क्या कहा जाए? क्या यह नहीं है कि दिल्ली में सरकार कोई भी हो, वह दुश्मन के सामने कायर थी, है और रहेगी। उसके लिए भारतीय जवान का खून, खून नहीं पानी है? यही सत्य है। इस सत्य से इतर कुछ कर दिखाना अपने बस में नहीं है। फिलीस्तीनी, हमास या हिजबुल्ला आदि में से कोई इजराइल में वारदात कर डाले या रॉकेट दागे तो तुरंत इजराइली प्रधानमंत्री आपात बैठक बुलाएगा और घंटों में जवाबी कारर्वाई के राकेट छूट जाएंगे। अमेरिका, इजराइल, चीन या योरोपीय देश के किसी एक सैनिक की कहीं हत्या तो हो जाए, इनका कोई नागरिक कहीं फंस तो जाए, सरकार की पूरी ताकत बदला लेने, सबक सिखाने या उसे छुड़वाने में लग जाएगी। इसलिए कि ये देश अपने नागरिक, अपने सैनिक को पूरे राष्ट्र-राज्य का पर्याय मानते हैं। इनके लिए उनका सैनिक देश की आन, बान, शान है। उसका खून, खून है पानी नहीं!
भारत में न हम लोग ऐसा मानते हैं और न हमारे नेता।
हमारे नेता राष्ट्रपति ओबामा से सीख सकते हैं, नहीं तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से सीख सकते हैं। ओबामा ने बुधवार को रूस के राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात रद्द की। इसलिए कि रूस ने अमेरिकी भगोड़े एडवर्ड स्नोडेन को शरण दी है। विश्व राजनीति के धुरंधर यह खतरा बता रहे हैं कि कहीं यह शीत युद्ध की शुरुआत नहीं हो। पुतिन का स्नोडेन को शरण देना और ओबामा का मुलाकात रद्द करना दोनों घटनाएं दो सार्वभौम राष्ट्र की एक-दूसरे के खिलाफ कूटनैतिक कार्रवाई हैं। और ऐसा करते हुए पुतिन और ओबामा कंपकंपाएं नहीं। शीत युद्ध का खौफ नहीं पाला। अब डेविड कैमरन की मिसाल। कोई ढाई महीने पहले ब्रितानी प्रधानमंत्री कैमरन ने अपने एक फौजी की दक्षिणपूर्व लंदन के वूलविच इलाके में हत्या की घटना सुनी तो उन्होंने फ्रांस का दौरा रद्द किया। वे लंदन लौटे। कैबिनेट की बैठक की। मीडिया के सामने आए और चेतावनी देते हुए कहा ब्रिटेन कभी भी नहीं झुकेगा। सवाल है क्यों कैमरन ने एक फौजी के लिए विदेश यात्रा रद्द की? क्यों एक स्नोडेन के लिए ओबामा ने शीत युद्ध के बादल मंडराने का खतरा मोल लिया? पुतिन ने क्यों स्नोडेन, सीरिया आदि पर अमेरिका से पंगा लिया हुआ है तो ओबामा क्यों स्नोडेन के मुद्दे को इतना तूल दे रहे हैंदरअसल यह राष्ट्र-राज्य में परस्पर सहज-सामान्य व्यवहार है। लेकिन जो रूस और अमेरिका या महाशक्ति देशों के लिए सहज है वह भारत ऱाष्ट्र-राज्य के लिए असहज है। किसी ने ठीक पूछा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी क्या कर लिया था? ऑपरेशन पराक्रम बना कर उन्होंने सेना को सीमा पर भेजा थाछह महीने सेनाएं सीमा पर रहीं और आखिर में वाजपेयी संधि करने चल पड़े। हम ऑपरेशन पराक्रम कागजों में बनाते हैं लेकिन आपरेशन की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं। इसलिए कि उसके लिए साहस चाहिए और साहस की घुट्टी न केवल लीडरशीप ने बल्कि पूरे राष्ट्र-राज्य ने पी हुई हो।
पर तथ्य यह भी है कि लीडरशीप साहसी बनवाने में निर्णायक होती है। इंदिरा गांधी को यदि आज सर्वाधिक याद किया जाता है तो एकलौती वजह पाकिस्तानी की ठुकाई करते हुए उनका बांग्लादेश बनवाना था। तब भी खतरा था। अमेरिका ने एटमी हथियारों से लैस नौसेनिक बेड़े को बंगाल की खाड़ी में पहुंचाया था। लेकिन रामनाथ राव, थल सेना प्रमुख मानेकशा जैसे चार-पांच लोगों की ऐसी लीडरशीप थी जिसने हौसला बनवाए रखा और साहस पर खौफ को हावी नहीं होने दिया। पुतिन के पास भी एटम बम है तो ओबामा के पास भी है। इन दोनों को एटमी जंग होने का खतरा क्यों नहीं लगता है और अपने अटल बिहारी वाजपेयी या डा. मनमोहन सिंह क्यों कंपकंपाते हैंक्या इसलिए कि पाकिस्तान और उसकी सेना मवाली है। वह जिम्मेवार देश नहीं है उसकी सेना जिम्मेवार नहीं है।
यही अपने डर, अपने खौफ का सत्व-सत्व है। भारत राष्ट्र-राज्य का तंत्र और उसकी मशीनरी चौबीस घंटे इस सावधानी में रहती है कि हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिससे बात बिगड़े। जिससे पाकिस्तान गुस्सा हो। हिसाब से हमें पांच सैनिकों की हत्या पर गुस्सा होना चाहिए था लेकिन उलटे पाकिस्तान के प्रवक्ताओं के भाषण सुनाई दिए। हमारे रक्षा मंत्री पाकिस्तान का नाम नहीं लेने की फिक्र में इसलिए रहे ताकि डा. मनमोहन सिह और नवाज शरीफ की मुलाकात का माहौल नहीं बिगड़े। भला यह क्या नीति हुई? हम क्यों यह बेसिक फैसला भी नहीं ले सकते कि जब पाकिस्तान की सेना मवाली है, अनियंत्रित है तो हम भी अपनी सेना को यह छूट दें कि वह जैसे को तैसा जवाब देने के लिए स्वतंत्र है। मतलब लोकल यूनिट, लोकल कमांडर दुश्मन के हमले का मुकाबला करने या उसका जवाब देने के लिए स्वायत्त है। पर ऐसा विचार ही कंपकंपी पैदा कर देगा। इसलिए कि हमें अपनी सेना पर भरोसा है लेकिन पाकिस्तानी सेना पर नहीं है। इसलिए नीति यह है कि जैसा चल रहा है वैसा चलता रहे। हमें न पुतिन बनना है न ओबामा और न कैमरन। हम हिंदू मिजाज में ऑपरेशन पराक्रम बनाएंगे और आर-पार की लड़ाई की बात भी करेंगे। लेकिन संयमित रहेंगे और एक दिन अचानक बस में बैठ संधि करने लाहौर चल पड़ेंगे। अंत में कारगिल झेलेंगे।
यही चक्र है। इसी में मनमोहन सिंह चले हैं। अपने नेताओं ने यह कभी सोचा ही नहीं कि ताकत का भय दिखाए बिना दोस्ती नहीं बनती है, नहीं चलती है।
वाजपेयी जी ने जब एटम बम बनवाया था तो वह कुछ वैसा ही था जैसे राजा-महाराजा अपनी बैठक खाने को तलवारों- बंदूकों-शेर की खालों से सजाया करते थे। बैठक खाने से बहादुरी बघारते थे। बैठक खाने में सजे ये हथियार  दुश्मनों से लड़ने के काम नहीं आते थे। लड़ने के बजाय राजा संधि करता था और हथियारों की दशहरे पर आरती उतारता था। जस का तस वही मनोविज्ञान आज भी है। दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देना या बदला लेना अपना मनोविज्ञान नहीं है। इसलिए कि मुर्दा कौम सहने के लिए है, बरदाश्त करने के लिए है, खून के घूट पीने के लिए है, शांति के कबूतर उड़ाने की मजबूरी के साथ इस बेबसी, लाचारी को लिए हुए है कि करें तो क्या करें। हमे संयम रखना है। हमें मियां नवाज से उम्मीद रखनी है।
सो कृपया कतई नहीं सोचें कि चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश या ऐरे-गैरे मालदीव जैसे देश के आगे कोई भारतीय नेता यह हुंकारा कभी मार सकता है कि चौबीस घंटे में भारत के सैनिकों के हत्यारे सुपुर्द करो अन्यथा भारत की सेना मार्च करेगी। नहीं, ऐसा सोचें ही नहीं। भारत सरकार की सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी में यह विचार ही कंपकंपी छुड़वा देगा। कृपया अपने डा. मनमोहन सिंह, एके एटंनी, शिवशंकर मेनन सबको चैन से सोने दें!
अपन ने गूगल में यह सवाल टाइप किया कि भारतीय सेना के हाथों कितने पाकिस्तानी सैनिक मरे? जवाब ने आंखे खोली। जवाब में उलटे भारतीय सैनिकों के मरने के हैडिंग निकले! मतलब गूगल बताएगा कि मरने का खाता भारतीय सैनिकों का है न कि पाकिस्तानी सैनिकों का। पाकिस्तानी सैनिकों के मरने की घटनाएं बिरली है। तभी पाकिस्तानी सैनिकों की हत्या का सवाल करेंगे तो भारतीय सैनिकों की हत्या की खबर तलाश में बाहर आएगी। बावजूद इसके अपन ने गूगल सर्च के नतीजे के एक के बाद एक पांच पेज खोल कर देखें और उनमें पाकिस्तानी सैनिकों की हत्या की खबर तलाशी।
दो खबरें मिली। एक 15 फरवरी 2013 की थी। एक पाकिस्तानी सैनिक सीमा पार विवादित कश्मीर इलाके में भटक गया और भारत के सैनिकों के हाथों मारा गया। दूसरी खबर पाकिस्तान के दि नेशन की थी। 23 मई 2010 की डेटलाइन का यह समाचार था कि दोनों तरफ की गोलीबारी में एक पाकिस्तानी सैनिक मरा। भारत की तरफ से कहां गया कि गोलीबारी की शुरूआत पाकिस्तान की तरफ से हुई। इसके साथ यह बैकग्राउंड भी थी कि मुंबई पर आंतकी हमले के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव है और 18 मई को भी दोनों तरफ से गोलीबारी हुई थी जिसमें दो भारतीय जवान मारे गए थे।
बस, पाकिस्तानी सैनिक के मारे जाने बाबत सिर्फ ये दो जिक्र मिले। और गूगल सर्च के पूरे पांच पेज भारतीय सैनिकों के मरने, उनकी हत्या, सर कलम होने और पाक सेना की अमानवीयता या बर्बरता की खबरों से भरे हुए है। यह हकीकत है। भारत-पाकिस्तान की तनातनी के इतिहास में लिखित या अलिखित में यह घटना कहीं नहीं मिलेगी कि किसी पाकिस्तानी सैनिक का भारतीय सेना ने सर कलम किया या गस्त लगा रहे पाकिस्तानी सैनिकों की टुकडी पर घात लगा कर भारतीय सैनिकों ने उनकी हत्या की।
ठिक विपरित पाकिस्तानी सेना और सैनिकों की भारतीय सैनिकों के साथ छल, घात लगा कर हमले, हत्या और सर कलम करने का सिलसिला अनवरत है। भारत के पांच सैनिकों की हत्या से पहले की घटना  8 जनवरी 2013 की दो भारतीय सैनिकों के सर कलम करने की है। तब पाक स्पेशल फोर्स के सैनिकों ने भारत की सीमा में 600 मीटर घुस कर भारत के दो सैनिकों को मारा था। उनके धड़ से सर अलग किया। इससे पहले 2011, 2003 1999 में भी पाकिस्तानी सैनिको ने ऐसी ही क्रूरता दिखाई। 1999 में कारगिल के ककसर सेक्टर से कैप्टन कालिया को पाकिस्तानी पकड कर ले गए। 22 दिन टार्चर किया। उसकी आंखे फोड डाली और पूरी तरह से क्षत-विक्षत लाश भारत को दी। एक टीकाकार कर्नल आर हरिहरन के लिखे पेपर के अनुसार 1971 की लडाई में भी पाकिस्तानी सैनिकों की ऐसी ही क्रूरता और बर्बरता देखी गई। उसने अपने कब्जे के भारतीय सैनिकों की आंखे फोड भारत को लौटाया।
मतलब किसी भी तरह सर्च करे, खोज कर ले, तुलना कर लें सबसे तथ्य यह निकलेगा कि पाकिस्तान सभ्य नहीं है। उसकी सेना मवाली है। उसके हाथों भारत लगातार घायल है। कभी आंतकी हमला होता है, कभी भारत के सैनिकों के सर कलम करता है तो कभी रात के अंधेरे में भारतीय सैनिकों पर घात लगा कर हमला किया जाता है। उसके पांच सैनिक मार डाले जाते है!
और हमारी सरकार, अपने रक्षा मंत्री देश को यह बताते है कि यह करतूत पाकिस्तानी सेना की नहीं बल्कि पाक सेना की वर्दी पहने हुए आंतकियों की थी।
कितना शर्मनाक है यह!
और यदि इस पर कोई गुस्साएं, सरकार से सवाल पूछे, सरकार की आलोचना करें या अपने मन की बात बेबाकी से कहे तो उसे क्या अल्ट्रा नेशनलिस्टकरार दिया जाएं?
मतलब देश और देशभक्ति और जैसे को तैसे जवाब की सोचना अब अपने यहां अतिवाद है। समझदार वह है जो पाकिस्तान को दुश्मन नहीं माने और यह सोचे कि वह पागल है तब भी उससे दोस्ती की जानी चाहिए।  इसलिए कि सब वहां पागल नहीं है। प्रधानमंत्री मिंया नवाज भले है, जरदारी भले है वहां के लोग भले है और फिर दोनों तरफ एक ही तो खून है। इसलिए उसके पागल सैनिकों ने यदि पांच भारतीय सैनिकों की हत्या की है तो उनका चुपचाप क्रियाकर्म कर डालो। भडकाने से नहीं बल्कि समझाने से बात बनेगी। पागल को बिजली के शॉक से नहीं बल्कि हम थेरेपी यानि संवाद से दुरूस्त करेंगे!
और जो शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत बताते है वेअल्ट्रा नेशनलिस्टहै। ऐसे अल्ट्रा नेशनलिस्टो से भारत को बचाया जाएं!
अब आप भी विचार करें कि क्या सही है और क्या गलत?
नया इंडिया में श्री हरिशंकर व्यास के तीन लेख पढ़कर मेरी नज़रों के सामने वह मंजर घूम गया जब बांगलादेश के योद्धा भारतीय सैनिकों के अंगभंग मृत शरीर एक डंडे पर जानवरों की तरह लटका कर भारतीय सीमा में फेंक गए थे | इतना ही नहीं तो जिस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर भाजपा का नीति नियंता होने का आरोप लगता है, उसके भी पांच प्रचारकों को अपहरण कर बांगलादेश में ले जाकर मार दिया गया था | तत्कालीन लौह पुरुष गृह मंत्री, आज के स्वघोषित पी एम इन वेटिंग ने इन घटनाओं पर सियापा भी नहीं किया था | लेकिन विचार करें कि यह कमजोरी क्या केवल नेताओं की है ?



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