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सच है जीवन में मुसीबतें भी आतीं  
पर यह भी है उतना ही सच कि वे चली भी जातीं  
भूख न हो तो भोजन का क्या मजा  
जीवन में गर हों खुशियाँ ही खुशियाँ तो लगेंगी सजा |
विध्वंस में भी कहीं न कहीं सृजन गुनगुनाता है |
हर बुराई में छिपी भलाई, मानव समझ नहीं पाता है ||
रंज इसका नहीं कि हम टूटे , 
ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे . 
आई थी जिस हिसाब से आंधी ,
उसकी सोचो , तो पेड़ कम टूटे .
एक अफवाह थे सभी रिश्ते ,
टूटना तय था ,सो हम टूटे .
जिंदगी जीने का सबब लेकिन,
ना टूटा ये कैसे करम फूटे .
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रात श्याम सपने में आये,
महिया पिया ना माखन खाए !
केवल मुझसे ही बतियाये,
जाते जाते मुझे उलझाए !
बोले करूंगा तुम्हारा काज,
एक ऑप्शन चुन लो आज !
या तो धन से झोली भर लो,
सारी दुनिया को क्रय कर लो !
या फिर खुद ही बनो अनमोल,
कल आऊँ तब तक तय कर लो |
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आत्म कथ्य - तीन मनःस्थिति
(१)
अपना कौन पराया कौन
प्रश्न हुआ है गौण
स्वार्थ साधना के इस युग में
श्रेयस्कर है मौन !

(२)
अंग्रेजों के मानस पुत्तर
बैठे हैं सिंहासन पर
प्रजातंत्र की दूध मलाई
चालाकी पीती जी भर !

(३)
कैसे छायेगी हरियाली
ऊसर में डालेंगे बीज
हम ही ने तो चुना वोट दे
मन में फिर क्यूं आती खीज ?
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मन मतंग धुल को शीश धर
गंगा की धार को पीठकर,
मस्त अठखेली में खेलता रहा
हार को जीतमान ठेलता रहा
यूंही एक और वर्ष बीत गया
जीवन घट कुछ और रीत गया
जो बीत गया कल कभी नहीं आएगा
उसकी यादों में आज भी खो जायेगा
मन जो चला गया उसके लिए रोता है
जो आया नहीं उसके स्वप्न संजोता है
परन्तु वर्तमान को गढ़ता नहीं सोता है
सत्कर्मों की फसल काट दुष्कर्म बोता है
प्रभु दें विवेक अंकुश का वरदान
दिग्भ्रमित मन को करें सावधान



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