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11 अगस्त 2013 को इराक की राजधानी बगदाद और इससे सटे क्षेत्रों में मुख्य रूप से शिया बहुल इलाकों में हुए सिलसिलेवार कार बम विस्फोट मे कम से कम 64 लोगों की मौत हो गई और 189 अन्य घायल हो गए।

पुलिस ने बताया कि शहर के बाजारों और भीड वाले शापिंग केन्द्रों को निशाना बनाकर 10 सिलसिलेवार कार बम विस्फोट किए गए। विस्फोट में राजधानी से लगे तुज खुरमातो शहर में कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई और करीब 45 लोग घायल हो गए। इसी तरह यहां से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर नासिरिया में दो कार बम विस्फोट में चार लोगों की मौत हो गई और आठ लोग घायल हो गए।

इराक में इस वर्ष की शुरआत से इस तरह की हमले की घटनाएं तेजी से बढी हैं। इस वर्ष जुलाई तक इस तरह के विस्फोट में 1000 लोगों की जानें गई हैं। मंगलवार को भी राजधानी में हुई इसी तरह के विस्फोट की घटना में कम से कम 50 लोग मारे गए थे। तो प्रश्न उठता है कि आखिर मुस्लिम समुदाय शिया और सुन्नी के बीच का आखिर यह झगड़ा है क्या ?
इमाम हुसैन हजरत मोहम्मद साहब की बेटी फातिमा के सुपुत्र थे | सातवीं शताव्दी में कर्बला नामक स्थान पर सम्बन्धियों सहित उनकी ह्त्या कर दी गई | उस समय दुधमुंहे बच्चों को भी नही बख्शा गया | यह नरसंहार मुहर्रम महीने के दसवें दिन हुआ था | आश्चर्यजनक पहलू यह है कि उस लड़ाई में पेशावर के मोहियाल ब्राहमणों ने भी हुसैन साहब की मदद की थी | ब्राहमण सेनापति राहिब दत्त के सातों बेटे इस लड़ाई में शहीद हो गए थे | तब से ही शिया समुदाय का भारत के प्रति लगाव बना हुआ है | इमाम हुसैन के पक्ष में लड़ने के कारण मोहियल ब्राहमणों को हुसैनी ब्राह्मण भी कहा जाता है |जम्मू कश्मीर के पुंछ में आज भी मोहियाल ब्राह्मणों के घर हैं |
ईरान पर भी मुसलमानों ने सातवीं शताब्दी में ही हमला कर उसे गुलाम बना लिया था | और जैसा कि हर जगह हुआ उसे जल्द ही धर्मान्तरण कर मुसलमान भी बना लिया | शारीरिक रूप से तो ईरान पराजित हो गया किन्तु मानसिक रूप से उन्होंने पराजय स्वीकार नहीं की | इमाम हुसैन की परिवार सहित ह्त्या कर दिए जाने के बाद ईरानियों को अपने अपमान का बदला लेने का अवसर मिला और वे अरब मुसलमानों के खिलाफ शिया समुदाय के रूप में संगठित होने लगे | और आज ईरान और ईराक दोनों ही शिया बहुसंख्यक देश हैं |
उन्होंने इस्लाम पूर्व के अपने इतिहास को छोड़ने से इनकार कर दिया | उन्होंने नवरोज इत्यादि ईरानी उत्सव मनाने और कुरुष महान के गीत गाने शुरू कर दिए | तब से शुरू हुआ ईरानियों और अरबों का युद्ध | अब भी यह किसी न किसी रूप में चलता ही आ रहा है और शिया मुसलमान कट्टर सुन्नी मुसलमानों के गुस्से का शिकार होता रहता है | जब शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत को दिल से याद करते हुए, उस दिन सुन्नियों ने जो अत्याचार किये थे, उनकी निंदा करता है तो मुस्लिम समाज आज भी उत्तेजित हो जाता है |
पकिस्तान में तो शिया समाज के पूजा स्थलों पर हमला आम बात है | इन हमलों में अब तक हजारों शिया मारे जा चुके हैं | जम्मू कश्मीर का पाकिस्तान अधिकृत गिलगित और बलतिस्तान शिया बहुसंख्यक क्षेत्र है | वहां अब योजनाबद्ध रूप से पंजाब के खैबर पख्तूनखवा से मुसलमानों को लाकर बसाया जा रहा है, ताकि शिया समुदाय अल्पसंख्यक हो जाए | वहां शिया समुदाय की हत्याओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है | दुर्भाग्य से भारत सरकार ने आज तक अपने नागरिकों पर हो रहे इन अत्याचारों के खिलाफ पाकिस्तान से विरोध प्रदर्शित करने की जहमत नहीं उठाई | लगता है पकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत सरकार ने पकिस्तान का ही अंग मान्य कर लिया है |
किन्तु अब कट्टरपंथी मुसलमानों ने वही खेल कश्मीर घाटी में भी शुरू कर दिया है | शिया समुदाय का दोष केवल इतना है कि वह पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थक नहीं है | वह सदा से भारत समर्थक रहा है | इसी कारण पिछले दिनों बडगांव में एक छोटी सी कहासुनी के बाद अनेक गाँवों में शिया समुदाय के घरों और दुकानों पर हमले शुरू हो गए | अनेक लोग घायल हुए और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गई | शिया इबादतगाह भी इसके शिकार हुए | फातिमा नामक एक महिला की सर पर सरिया मारकर ह्त्या कर दी गई | मुझे कोई ताज्जुब नहीं है कि फातिमा बीबी की इस ह्त्या पर तमाम मानवाधिकारवादी और दिग्विजय सिंह जी चुप्पी साधे हुए है | आखिर अल्पसंख्यक फातिमा की मौत पर मर्सिया पढ़ने से बहुसंख्यक मुसलमानों के वोट जाने का खतरा जो है | कैसा संयोग है कि इमाम हुसैन की माँ का नाम भी फातिमा ही था |
नया इंडिया में दिनांक 9 अगस्त 2013 को प्रकाशित रिपोर्टर डायरी के आधार पर |

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