वक़्त की अठखेली,
वह रह गई अकेली
गईं दूर सब सहेली,
जीवन बना पहेली
एकाकी और उदास,
बस इक कागज़ था पास
उस पर जब भाव उकेरे
दिग्दिगंत थे ठहरे
कागज़, कलम दवात, ब ले लिए थे साथ
तब चाँद ओ सितारे, सब आ गए थे हाथ
सिहरन उठी थी तन में, कहने लगी वो मन में
ब कायनात मुट्ठी में, मैं व्याप्त हुई कण कण में
अब प्यारा है एकांत, रहता तन मन है शांत
जब खुद की बनी सहेली, तो दूर हुए सब भ्रांत |
हे मेरी मानस गंगा, तुझमें मैं हूँ या मुझमें तू ||
प्रकृति याकि नियंता, जग में कुछ तो वह तू ही तू ||
बस तू ही तू, बस तू ही तू |||

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