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मुजफ्फर के नगर में आह जो कुछ हो रहा,
चिर प्रतीक्षित नींद में, भाई किसी का सो रहा |
वोट कुर्सी को परे रख, इक नजर डालो वो कौन, 
इस घृणा के ज्वार तट पर, शीश पकडे रो रहा |

कंस सूदन का सुदर्शन सुप्त है,
वह वीर राणा ओ शिवा भी लुप्त है |
वंश असुरों का बढ़ा जाता यहाँ,
देवत्व जाने किस गुहा में लुप्त है ||

आज दंगे है हुए, उस राम श्याम प्रदेश में,
मारीच जीवित है जहां, स्वर्ण मृग के वेश में |
कंस के ही साथ दिखती यादवी सेना है आज,
गीता ज्ञान का सन्देश फिर गूंजे यहाँ परिवेश में ||

बीज विष के बो रहे, जो आज उनको जान लो,
इस राष्ट्र रूपी वृक्ष की जड़ खोदते पहचान लो |
यह चिर सनातन संस्कृति मिट जायेगी इतिहास भी,
हमको क्षमा कर पाये ना यह जान लो ||

मत चूके चौहान,
करो अब वाण फिर संधान ||

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