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23 फरवरी 1897 को कटक के प्रसिद्ध वकील जानकी नाथ बोस तथा माता प्रभावती देवी के घर जन्मे सुभाष चन्द्र बोस के जीवन के वे प्रसंग जो हर भारतवासी को गौरवान्वित करते है -
जेल में रहते हुए नेताजी के मन में विदेश जाकर देश की आजादी के लिए प्रयत्न करने की रूपरेखा तैयार हो चुकी थी | 17 जनवरी 1941 को पेशावर पहुंचे | छः दिनों में किसी प्रकार पासपोर्ट का जुगाड़ कर एक इटैलियन “मिस्टर करोटना” का हुलिया बनाया तथा दो जर्मन व एक इटैलियन के साथ वे 28 मार्च 1941 को बर्लिन पहुंचे | अक्टूबर से रेडिओ प्रसारण द्वारा देश की आजादी का माहौल बनाने का कार्य तथा विश्व को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी के समाचार प्रसारित करना प्रारम्भ किया |
1942 में अंग्रेज सेना ने सिंगापुर में जापानी सैनिकों के सम्मुख आत्म समर्पण किया, उसके बाद 1943 में नेताजी ने आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की | सिंगापुर में रानी झांसी रेजीमेंट की स्थापना कर केप्टिन लक्ष्मी स्वामीनाथन को उसका संयोजक नियुक्त किया | कर्नल रतूड़ी के नेतृत्व में 10 मार्च 1944 को अराकान मोर्चे पर घमासान युद्ध के बाद अंग्रेज सेना को परास्त कर भारत भूमि पर विजय ध्वज फहराया | मणिपुर के मोरांग पर तिरंगा फहराने के बाद 8 अप्रेल 1944 को कोहिमा का किला फतह कर लिया | इतना ही नहीं तो इम्फाल के चारों ओर भी अपना घेरा डाल दिया |

4 जुलाई 1944 को सिंगापुर में आजाद हिन्द फ़ौज के सैनानियों के सम्मुख उनका वह ऐतेहासिक भाषण हुआ, जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता का मूल्य बलिदान बताते हुए “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा” का सिंहनाद किया | 4 अगस्त 1944 को रंगून रेडियो से अपने प्रसारण में उन्होंने महात्मा गांधी से भावनात्मक अपील की | यदि उस समय गांधी जी ने उनका साथ दिया होता तो भारत 47 के पूर्व आजाद हो गया होता और संभवतः पाकिस्तान का जन्म भी न होता | मां भारती अखंड स्वरुप में विद्यमान होतीं |

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