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प्रस्तुत आलेख प्रसिद्ध गांधीवादी चिन्तक व विचारक स्व. श्री धर्मपाल जी की पुस्तक "भारतीय चित्त, मानस एवं काल" के आधार पर है | धर्मपाल जी के अनुसार अपनी मूल समस्या को जाने बिना हम अपनी परेशानियों से निजात नहीं पा सकते |

भारत बहुत विशाल देश है | चार पांच हजार वर्षों से ब्रह्मदेश, श्रीलंका, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया, मलेशिया, अफगानिस्तान, ईरान आदि पडौसी देशों के साथ उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है | भारतीयों का स्वभाव और उनकी मान्यताएं उन देशों के साथ बहुत मिलती जुलती हैं | सन 1500 के बाद एशिया पर यूरोप का प्रभाव बढ़ा, उसके बाद उन सभी पडौसी देशों के साथ की पारस्परिकता लगभग समाप्त हो गई | उसे पुनः स्थापित करना जरूरी है | इसी प्रकार यूरोप, खासकर इंग्लेंड और अमेरिका के साथ तीन चार सौ वर्षों से जो सम्बन्ध बढे हैं, उनका भी समझबूझकर फिर से मूल्यांकन करना जरूरी है | यह हमारे लिए और उनके लिए भी श्रेयस्कर होगा |
भारत की शिक्षा व्यवस्था की उपेक्षा करते करते उसे नष्ट कर उसके स्थान पर यूरोपीय शिक्षा लागू करने, प्रतिष्ठित करने का कार्य भारत को तोड़ने की प्रक्रिया में सिरमौर था | यूरोपीय शिक्षा प्राप्त लोगों के विचार, मानस, व्यवहार, द्रष्टिकोण सब कुछ बदलने लगा | हमें अंग्रेजों का दास बनने में गौरव का अनुभव होने लगा | जो भी यूरोपीय है, वह विकसित है, आधुनिक है, श्रेष्ठ है और जो भी अपना है वह निकृष्ट है, हीन है, लज्जास्पद और गया बीता है, ऐसा हमें लगने लगा | इस गुलामी की मानसिकता के आगे अपनी विवेकशील और तेजस्वी बुद्धि भी दब गई | यूरोपीय जैसा बनना ही हमारी आकांक्षा बन गई और देश को भी वैसा ही बनाने का प्रयास हम करने लगे |
ऐसे में 1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये | उन्होंने जनमानस को जगाया, उसमें प्राण फूंके, उसकी भावनाओं को अपनी वाणी और व्यवहार से अभिव्यक्ति दी | भारत के लिए योग्य हजारों वर्षों की परम्परा के अनुरूप व्यवस्थाओं, गतिविधियों और पद्धतियों को प्रतिष्ठित किया और भारत को फिर से भारत बनाने का प्रयास किया | स्वतन्त्रता के साथ स्वराज को भी लाने के लिए वे जूझे | परन्तु स्वतन्त्रता महज सत्ता का हस्तांतरण बन कर रह गया | उसके साथ स्वराज नहीं आया, सुराज की तो बात ही करना व्यर्थ है | यही आज की समस्त अव्यवस्थाओं का मूल है | स्वतंत्र भारत में भी हम यूरोप अमेरिका की ओर मुंह किये बैठे हैं | यूरोप के अनुयाई बनना ही हमें अच्छा लगता है |
परन्तु यह क्या समस्त भारत का सच है ? भारत की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या यूरोपीय विचार और शैली को जानती भी नहीं है, मानना तो दूर की बात है | उनके रीति रिवाज, मान्यताएं, पद्धतियाँ, सब वैसी की वैसी ही हैं | अंग्रेजीदां लोग उन्हें पिछड़े और अन्धविश्वासी कहकर उनकी आलोचना करते हैं, उन्हें नीचा दिखाते हैं और अपने जैसा बनाना चाहते हैं | यही उनकी विकास और आधुनिकता की परिभाषा है | यूरोप बनने की इच्छा करने वाला इंडिया अपने असफल प्रयत्नों से कुंठित हो रहा है, जबकि भारतीय भारत उलझ रहा है, छटपटा रहा है और शोषित हो रहा है | सौभाग्य से क्षीणप्राण होने के बाद भी भारतीय भारत निष्प्राण नहीं हुआ है, अतः स्वाधीन होकर समृद्ध और सुसंस्कृत होने की आशा शेष है  |
एक बार चर्चा में तत्कालीन प्रधान मंत्री ने इस प्रकार के विचारों को अठारहवीं सदी का बताया | कहने लगे अब तो बीसवीं इक्कीसवीं सदी की बात होना चाहिए | जवाहरलाल नेहरू भी इस बात को लेकर बहुत परेशान थे कि लोग अठारहवीं सदी से बाहर ही नहीं निकल रहे | किन्तु हो सकता है कि अपने यहाँ के आमजन तो अठारहवीं सदी में भी न हों, किसी पौराणिक युग में रह रहे हों | स्वयं को कलियुग में मानकर किसी अवतारी पुरुष के आने की प्रतीक्षा में हों | अगर यह सच है तो इस कलियुग को समझने की चेष्टा करनी पड़ेगी | बीसवीं सदी का राग अलापते रहने से काम चलने वाला नहीं है | पर यह समझना तो अपने साधारण लोगों की द्रष्टि से ही होगा न ? हमें कलियुग की द्रष्टि से बीसवीं इक्कीसवीं सदी को समझना होगा, बीसवीं सदी की द्रष्टि से कलियुग को समझना संभव नहीं |
ऐसा हो सकता है कि आज भारत के सभी वासी भारतीय चित्त, मानस व काल की परम्परागत समझ में विश्वास न रखते हों | ऐसे भी भारतवासी होंगे जो कलि जैसे किसी युग के होने की बात ही नहीं मानते | भारतीय मुसलमानों, ईसाईयों और पारसियों में अनेक होंगे जो चतुर्युग व कल्प आदि को नहीं मानते होंगे | किन्तु इतना तो तय हैकि उनका अपना चित्त व काल आधुनिक यूरोपीय सभ्यता के चित्त व काल से मेल नहीं खाता | ऐसा माना जा सकता है कि भारत के अधिकतम आधा प्रतिशत लोगों को छोड़कर शेष 99.5 प्रतिशत लोगों का यूरोपीय आधुनिकता और उनकी बीसवीं इक्कीसवीं सदी से कोई लेना देना नहीं है | लेकिन इस आधुनिकता के प्रवाह में भारत के साधारणजन दब से गए हैं, उनकी पहचान खो सी गई है | यह पीड़ा सभी की साझी है | भारत के साधारण मुसलमानों, ईसाईयों आदि की भी |
इंदिरा गांधी निधि की ओर से आयोजित एक गोष्ठी में एक यूरोपीय विद्वान् ने सुझाव दिया कि भारत की समस्याओं का समाधान भारत के ईसाई हो जाने में है | भारत को ईसाई हो जाना चाहिए, यह बात पिछले दो सौ तीन सौ वर्षों से चली आ रही है | इसके लिए बड़े पैमाने पर सरकारी प्रयत्न भी होते रहे हैं | इसी ईसाईकरण का दूसरा नाम पश्चिमीकरण है, जिसे करने के प्रयत्न स्वतंत्र भारत की सरकारें भी करती चली आ रही हैं | भारत का ईसाईकरण मैकाले रास्ते से हो, कार्ल मार्क्स रास्ते से हो, या आज की वैज्ञानिक आधुनिकता के नाम पर हो, बात एक ही है |
लेकिन ऐसे समाधान शायद संभव नहीं हुआ करते | किसी सभ्यता के मानस व चित्त को पूरी तरह मिटाकर वहां एक नए मानस का प्रतिष्ठापन करना शायद संसार में संभव ही नहीं है | उसके लिए तो किसी सभ्यता का पूरा विनाश ही करना पड़ता है | उसके लिए तो किसी सभ्यता का पूरा विनाश ही करना पड़ता है, उसके सभी लोगों को समाप्त करके उनकी जगह एक नई प्रजा को बसाना पड़ता है | अमेरिका में कुछ बैसा ही हुआ | पर यूरोप के सभी प्रयत्नों के बावजूद भारत पश्चिम के हाथों ऐसी दुर्गति से अभी तक तक तो बचा है |
भारतीय सभ्यता का पश्चिमीकरण संभव नहीं तो फिर हमें अपने स्वयं के धरातल पर खडा होना होगा | भारतीयता की मर्यादा से मुक्त हुए कुछेक लाख लोग इंजीनियर, डाक्टर, दार्शनिक, साहित्यकार, वैज्ञानिक के रूप में भारत में रहें चाहे अमेरिका, जर्मनी, रूस, जापान में जा बसें, उससे क्या फर्क पड़ता है ? समस्या तो उन करोड़ों लोगों की है जो अपने स्वाभाविक मानस व चित्त के साथ जुड़कर अपने सहजकाल में रह रहे हैं | भारतीय मानस को समझने के लिए अपने प्राचीन साहित्य को तो समझना ही पडेगा | पिछले दो एक सौ सालों में पश्चिम वालों ने भारत के बारे में जानने की कोशिश की है | भारतीय धर्मशास्त्रों को, आयुर्वेद, ज्योतिष और शिल्प जैसी विद्याओं और विधाओं को समझने के प्रयास पश्चिमी विद्वान् करते रहे हैं | अपनी रूचि, समझ और आवश्यकताओं के अनुरूप वे भारतीय साहित्य को पढ़ते रहे | उनकी देखादेखी या प्रभाव में अपने यहाँ के कुछ आधुनिक विद्वान् भी इस कार्य में प्रवृत्त हुए और भारत के प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए अनेक नए नए संस्थान खुलने लगे | किन्तु भारतीय साहित्य पर जो भी काम हुआ उसका सार यही निकलता है कि आधुनिक पश्चिम में कोई विशेष वृत्ति या समझ है तो वह अपने ग्रंथों में पहले से ही थी | इतना ही नहीं तो वह आधुनिक पश्चिम के मुकाबले अधिक सबल और स्पष्ट थी | पर इस सबका क्या लाभ ? बीसवीं सदी की पश्चिमी आधुनिकता को ही प्रतिपादित करना है तो उसके लिए अपने पूर्वजों को साक्षी बनाने की क्या आवश्यकता ? यह तो अनाचार है |
सारनाथ में एक बार शिक्षा के विषय में विचार करने के लिए एक गोष्ठी हुई | गोष्ठी में अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति, दर्शनशास्त्र के प्रोफेसरों के साथ तिब्बतन इंस्टीटयूट के तत्कालीन निदेशक श्री सम्धोंग रिन-पो-छे भी थे | गोष्ठी के प्रारम्भ में विख्यात गांधीवादी विचारक श्री धर्मपाल ने प्रश्न उठाया कि जिसे हम शिक्षा कहते हैं, उसकी कोई परिभाषा है क्या ? लिखने पढ़ने की कला ही शिक्षा है, या कुछ और ?
तीन दिन तक इस प्रश्न पर कोई गौर नहीं हुआ, किन्तु चौथे दिन गोष्ठी समाप्त होने के कुछ पूर्व श्री सम्धोंग इस प्रश्न की ओर मुड़े | उन्होंने कहा कि "इस गोष्ठी में चार दिन जो बातें होती रही हैं, वह मुझे समझ में नहीं आईं, क्योंकि मैं तो इस एजूकेशन शब्द का अर्थ ही नहीं जानता | बैसे भी मुझे अंग्रेजी ज्यादा नहीं आती | किन्तु शिक्षा शब्द को मैं समझता हूँ | हमारे यहाँ इस शब्द का अर्थ है प्रज्ञा, शील और समाधि का ज्ञान |"
अगर उनकी यह परिभाषा सत्य है तो फिर आज भारत में कितने लोग शिक्षित हैं ? कितने विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे हैं ? कहीं भारत की सारी समस्याओं के मूल में इस शिक्षा का अभाव ही तो नहीं है ?

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