Google+ Badge

आर्थिक प्रश्नों के समाधान हेतु पश्चिम की ओर देखने का एक प्रमुख कारण यह भ्रम मूलक धारणा है कि भारतीय संस्कृति और धर्म अध्यात्म प्रधान होने के कारण भौतिक जीवन की समस्याओं के प्रति उदासीन है | यह भ्रम दूषित प्रचार एवं आध्यात्मिकता की गलत व्याख्या करने का परिणाम है | वास्तविकता तो यह है कि हमारे धर्म की व्याख्या भौतिकता का पूर्ण विचार करके चलती है | “यतोभ्युदयनिः श्रेयससिद्धिः स धर्मः” अर्थात जिससे ऐहिक और पारलौकिक उन्नति प्राप्त हो वह धर्म है | जिसने इस लोक को छोड़ दिया वह परलोक को नहीं बना सकेगा | भौतिकता और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी अथवा विलोम नहीं है | आध्यात्मिकता जीवन का एक दृष्टिकोण है जिससे हम सभी प्रश्नों की ओर देखते हैं | अध्यात्मवाद यदि विश्व की सही व्याख्या कर सकता है तो कोई कारण नहीं कि उसके द्वारा हम विश्व की समस्याओं का समाधानकारक हल न प्राप्त कर सकें |
धर्मस्य मूलमअर्थः
भारत ने भौतिक जगत का ही नहीं अर्थ का भी विचार किया है | महर्षि चाणक्य ने कहा, “सुखस्य मूलं धर्मः | धर्मस्य मूलं अर्थः |” सुख का मूल धर्म है तो धर्म अर्थमूलक | अर्थ के बिना धर्म नहीं टिकता | यहाँ हम धर्म की व्यापक परिभाषा लेते हैं, वह संकुचित एवं आधुनिक भ्रमपूर्ण अर्थ नहीं जो धर्म को मत, मजहब या रिलीजन समझ लेता है | जिससे समाज की धारणा हो, जो ऐहिक और पारलौकिक उन्नति में सहायक हो, जिसके कारण मानव के कर्मों का निर्धारण होकर वह कर्तव्य की संज्ञा प्राप्त कर ले, जिससे व्यक्ति अपनी सब प्रकार की उन्नति करता हुआ समष्टि के अभ्युत्थान में सहायक हो सके, वह नियम व्यवस्था और उसके मूल्य में निहित भाव धर्म है | यह धर्म अर्थ के अभाव में नहीं टिक सकता | कहा जाता है कि विश्वामित्र ने क्षुधा से अत्यंत पीड़ित होने पर रात्रि के समय चोरी करके चांडाल के घर से कुत्ते का झूठा मांस खाया | उन्होंने धर्म की अनेक मर्यादाओं को भंग किया | आपात धर्म की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने उनके इस व्यवहार को उचित ठहराया है | यदि अर्थ के अभाव की यह आपत्ति बराबर बनी रहे तो फिर आपात धर्म अर्थात चोरी ही धर्म बन जाए | और यदि यह आपत्ति समष्टिगत हो जाए अथवा समष्टि का बहुतांश इससे व्याप्त हो तो वे एक दूसरे की चोरी करके अपने आपात धर्म का निर्वाह करेंगे | किन्तु जहां अभाव होगा वहां चोरी भी किसकी होगी ?  अर्थात उस परिस्थिति में समाज नष्ट हो जाएगा |
अर्थ का प्रभाव
अर्थ का अभाव ही नहीं अर्थ का अत्याधिक प्रभाव भी धर्म का नाश करता है | यह भारत का अपना विशिष्ट दृष्टिकोण है | पश्चिम के लोगों ने अर्थ के प्रभाव का विचार नहीं किया | अर्थ जब अपने में या उसके द्वारा प्राप्त पदार्थों में और उनसे प्राप्त भोग विलास में आसक्ति उत्पन्न कर देता है तब अर्थ का प्रभाव कहा जाता है | जिसे केवल पैसे की ही धुन लगी रहे वह देश, धर्म जीवन का सुख सब कुछ भूल जाता है | इसी प्रकार विषयाशक्त मनुष्य पौरुषविहीन होकर स्वयं और समाज के नाश का कारण बनता है | प्रथम प्रकार के प्रभाव में अर्थ की साधनता नष्ट होकर वह साध्य बन जाता है | द्वितीय में अर्थ धर्माचरण का साधन ना होकर विषय भोगों का साधन बन जाता है | विषय तृष्णा की कोई मर्यादा न होने के कारण एक ओर तो ऐसे व्यक्ति के सम्मुख सदैव अर्थ का अभाव ही बना रहेगा, दूसरे पौरुषहानि से उसकी अर्थोपार्जन की क्षमता भी कम होती जायेगी |
जब अर्थ ही समाज के प्रत्येक व्यवहार और व्यक्ति की प्रतिष्ठा का मानदंड बन जाए तब भी अर्थ का प्रभाव हो जाता है | ऐसे समाज में “सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ति” की उक्ति चरितार्थ होती है | मान सम्मान, राजनैतिक अधिकार तथा समाज में स्थान जब केवल धनवान व्यक्ति को ही प्राप्त हों, वहां लोगों में धन परायणता आ जाती है | जब समाज में सभी धन परायण हो जाए, तो प्रत्येक कार्य के लिए अधिकाधिक धन की आवश्यकता होगी | धन का प्रभाव प्रत्येक के जीवन में अर्थ का अभाव उत्पन्न कर देता है |
जीवन के मानदण्ड
समाज से अर्थ के प्रभाव व अभाव दोनों को मिटाकर उसकी समुचित व्यवस्था करने को ‘अर्थायाम’ कहा गया है | आवश्यक है कि समाज के मानदण्ड ऐसे बनाए जाएँ कि हर वस्तु पैसे से न खरीदी जा सके | निश्चित ही यह कार्य केवल अर्थ व्यवस्था के आधार पर नहीं किया जा सकता | देश के लिए लड़ने वाला सैनिक अपने जीवन की बाजी अर्थ की कामना से नहीं लगाता | अर्थ का लालच उसे देशद्रोह तो सिखा सकता है, देशभक्ति नहीं | स्त्री के सतीत्व का अपना मूल्य है, उसे अर्थ की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता | वैद्य रोगी की चिकित्सा के बदले में अर्थ किन मूल्यों के आधार पर ले सकेगा ? अध्यापक विद्यादान का मूल्य नहीं लगा सकता | सरकारी कर्मचारी किस आधार पर एक फाईल को आगे सरकाने के लिए मूल्य लेगा ? दुर्बल की रक्षा करने वाली पुलिस जब अपनी सेवाओं का मूल्य मांगे, तब या तो दुर्बल की रक्षा ही नहीं हो पायेगी अथवा शरीर शक्ति में दुर्बल अपनी बुद्धि का उपयोग कर धूर्तता से धन कमाकर अपनी रक्षा का मूल्य चुकाएगा | श्रम का, शारीरिक और मानसिक, फिर उनका उपयोग चाहे दृश्य वस्तुओं के उत्पादन अथवा सेवाओं में हुआ हो, रुपये पैसे में मूल्य आंकना असंभव है | और फिर रुपया, वह भी तो स्थिर मूल्य नहीं | श्रम और पारिश्रमिक दोनों का, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में घनिष्ठ सम्बन्ध होने पर भी, व्यवहार जगत के लिए सर्वमान्य एवं सर्वंकष मूल्य सिद्धांत निश्चित करना न तो सरल है और न उपादेय ही | वास्तविकता तो यह है कि दोनों का मूल्यांकन पृथक मानदंडों से होता है | श्रम की प्रतिष्ठा उससे मिलने वाले अर्थ के कारण नहीं, अपितु उसके धर्मत्व से है | इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति को दिया गया पारिश्रमिक उसके द्वारा किये गए श्रम का प्रतिदान नहीं, बल्कि उसके योगक्षेम की व्यवस्था है | श्री मद्भगवतगीता में इसीलिए कर्म और फल दोनों को अलग अलग रखा गया है | कर्म लोकसंग्रहार्थ एवं ईश्वर भक्ति के रूप में करना है | श्री भगवान ने 9 वें अध्याय में कहा है –
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम ||
हे अर्जुन, तुम जो कुछ करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो देते हो और जो तप करते हो, वह सब मुझे अर्पण कर दो | हमारे कर्म का लक्ष्य भगवदाराधन ही हो सकता है | ऐसे भक्तों की चिंता का भार स्वयं भगवान् ने अपने ऊपर लिया है | उसी अध्याय में वे कहते हैं :
अनन्याश्चिन्तयन्तौ मां ये जनाः पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम ||
जो अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य कर्मयोगियों के योगक्षेम का मैं विचार करता हूँ |
गीतोक्त उक्त सिद्धांत के अनुसार कर्म की मूल प्रेरणा अनियंत्रित प्रतियोगिता अथवा लाभ की वृत्ति नहीं हो सकती | पाश्चात्य अर्थशास्त्र की ये मान्यताएं भारत के जीवन दर्शन से मेल नहीं खातीं | यह कहने से काम नहीं चलेगा कि आज हमारे व्यवहार और दर्शन में भारी अंतर है | वास्तव में तो समाज में आज भी अधिकाँश व्यक्ति अपने व्यवसाय और वृत्ति में कर्तव्य भाव से ही लगे हुए हैं | जितना हम इस भाव से दूर हटते जा रहे हैं, उतना ही हमारी समस्याएं विषम होती जाती हैं | हमें यदि अपने राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना है, तो उसकी प्रेरणा अपने जीवन दर्शन से ही लेनी होगी |
चार पुरुषार्थ
भारत ने इसीलिए मनुष्य का विभाजित विचार न करके पूर्णता के साथ विचार किया | मनुष्य की विभिन्न प्रवृत्तियों का चार मोटे मोटे भागों में वर्गीकरण करके उन सबकी संतृप्ति ही मानव का पुरुषार्थ बताया | ये चार पुरुषार्थ है : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष | ये चारों एक दूसरे के पूरक हैं | जो कर्म इन सबको प्राप्त कराने वाला हो वही श्रेष्ठ है | इनमें से किसी की भी अवहेलना करके चलने वाला व्यक्ति दुःख और अशांति का भागी बनता है |
इन चारों में से किसी एक को भी श्रेष्ठ या शेष का आधार समझना भी ठीक नहीं होगा | बैसे मोक्ष को परम पुरुषार्थ कहा है, क्योंकि उसको प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्तव्य नहीं बच रहता | किन्तु बिना धर्म, अर्थ और काम के मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं | महर्षि वेदव्यास ने कहा है “धर्मादर्थश्चकामश्च” अर्थात धर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है | जहां कोई व्यवस्था ही नहीं वहां अर्थ और काम की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? किन्तु दूसरी ओर हमने इसके पूर्व विवेचन किया है कि किस प्रकार अर्थ के बिना धर्म नहीं टिक पाता | वास्तव में ये चारों पुरुषार्थ अन्योन्याश्रित हैं | एक से दूसरे की रक्षा और संवर्धन होता है | जिस प्रकार प्राण अन्न से बलवान होते हैं तथा सबल प्राण अन्न को पचा सकते हैं, वैसे ही धर्म से अर्थ और काम की तथा अर्थ और काम से धर्म की धारणा होती है |
मनुष्य के जीवन का यह सर्वांगपूर्ण विचार ऐसी किसी भी अर्थ रचना की कल्पना नहीं कर सकता, जिसमें नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना किये बिना ही मनुष्य को सुखी बनाया जा सके |

Advertisement

 
Top