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13 दिसंबर 1946 को स्वतंत्र भारत का संविधान कैसा हो, उसका उद्देश्य क्या हो, इस विषय पर एक प्रस्ताव संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया था | अधिकाँश रियासतों के प्रतिनिधि भी वहां उपस्थित थे | हाँ मुस्लिम लीग ने उसका बहिष्कार किया था | उस अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा था –
सत्ता का केंद्र बिन्दु इस समय दिल्ली, कोलकता या मुम्बई में अर्थात बड़े नगरों में है | मैं उसे भारत के सात लाख गाँवों में बांटना चाहूंगा |

22 जनवरी 1947 को संविधान के हेतु और उद्देश्यों का प्रस्ताव पारित किया गया | उस समय देश की स्वतंत्रता का विषय अधिक प्रमुख था, अतः सबकी प्राथमिकता वही थी | संविधान विषयक विचार करने का कार्य केवल संविधान सभा का सचिवालय देख रहा था | उसके परामर्शक श्री बी. एन. राऊ की सहायता से उसने यूरोप, अमेरिका और रूस सहित विभिन्न देशों के संविधान का अध्ययन प्रारम्भ किया | स्वतंत्रता प्राप्त होने के कुछ दिनों बाद ही संविधान का प्रारूप सदस्यों के समक्ष रखा गया | 29 अगस्त 1947 को संसदीय विभाग के मंत्री ने प्रस्तुत संविधान के अन्वीक्षण और उसमें आवश्यक संशोधन करने के लिए एक समिति के गठन का प्रस्ताव रखा | इस समिति में निम्न सदस्य थे –
श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर

श्री एन. गोपालस्वामी आयंगर

डॉ. बी. आर. आंबेडकर

श्री क.मा. मुंशी

श्री सैयद महमद सादुल्ला

श्री बी.एन. मित्तर

श्री डी.पी. खेतान

किन्तु बिडम्बना ही कहा जाएगा कि उपरोक्त सात सदस्यों में से एक ने त्यागपत्र दे दिया, एक का स्वर्गवास हो गया, एक सज्जन लगातार अमेरिका में रहे, तो एक राजनीति में व्यस्त रहे | दो सदस्य दिल्ली के दूरस्थ अंचल के होने तथा स्वास्थ्य संबंधी कारणों से बैठकों में उपस्थित नहीं रह सके | इस कारण संविधान का प्रारूप तय करने का कार्य केवल अकेले डॉ. आंबेडकर जी के सर पर ही रहा | उन्होंने यह दायित्व बखूबी निभाया भी | किन्तु 4 से 9 नवम्बर 1948 के मध्य संविधान की पांडुलिपि के द्वितीय पाठ के दौरान हुई चर्चा के दौरान जो कुछ उन्होंने कहा उसने उन्हें आलोचना का केंद्र बना दिया | श्री अम्बेडकर ने कहा था –
.....संविधान की पांडुलिपि के सन्दर्भ में दूसरी आलोचना ऐसी की जा रही है कि उसके किसी भी अंश में प्राचीन भारत के राजतंत्रीय ढाँचे का समावेश नहीं है | कहा गया है कि नए संविधान की रचना पूर्णतः प्राचीन हिन्दू राज्य के उदाहरण के आधार पर होनी चाहिए | संविधान में पश्चिमी सिद्धांतों को समाविष्ट न करते हुए ग्राम पंचायतों एवं जिला पंचायतों के आधार पर उसकी रचना करनी चाहिए | कुछ अन्य लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि उन्हें कोई केन्द्रीय अथवा प्रांतीय सरकार नहीं चाहिए | वे तो भारत में व्यापक रूप से ग्रामीण राज्य चाहते हैं | यह सत्य है कि भारतीय बुद्धिजीवियों का ग्राम समूहों के प्रति अपरिमित प्रेम और करुणा है | इसका कारण विशेष रूप से मेटकाफ द्वारा उसके सन्दर्भ में की गई विशेष प्रशंसा है | मेटकाफ मानते हैं कि ग्राम अपने आप में स्वयमपूर्ण छोटे छोटे गणतंत्र ही हैं | उन्हें जो कुछ भी चाहिए, वह सब उनके पास है | किसी भी प्रकार से उन्हें बाहर के प्रदेशों पर आश्रित नहीं रहना पड़ता | मेटकाफ का अभिमत है कि हर प्रकार की क्रांतियों और कठिनाईयों का सामना इन छोटी रियासतों जैसे ग्राम समूहों ने भलीभांति किया है तथा स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखने में सफलता पाई है | निसंदेह ग्राम समूह ऐसी परिस्थति में भी बने रहे जहां कुछ भी बच पाना संभव नहीं था | परन्तु ग्राम समूहों के प्रति गौरव का भाव रखने वाले ये लोग इस बात का विचार नहीं करते कि देश के कामकाज और उसके भविष्य की दृष्टि से इन ग्राम समूहों की भूमिका कितनी नगण्य है |

राजवंशों का अस्तित्व एक के बाद एक समाप्त होता है | एक क्रान्ति के बाद दूसरी क्रान्ति आती है | हिन्दू पठान, मुग़ल, मराठा, सिक्ख, अंग्रेज, एक के बाद एक शासक बनते जाते हैं, परन्तु ग्राम समूह अपना अस्तित्व यथावत बनाए रखते हैं | आपत्तियां आने पर वे शस्त्रसज्ज होते हैं, दुर्ग बनाते हैं, सेनायें इलाके से गुजरती हैं, ग्राम समूह अपने पशुधन को छुपा लेते हैं और शत्रुओं को बिना छेड़े निकल जाने देते हैं |

देश के इतिहास में ऐसी भूमिका देखने के बाद ग्राम समूहों के प्रति हमारे ह्रदय में कितना गौरव शेष रहता है ? यह वस्तुस्थिति है कि उत्थान एवं पतन के कालखंड में उन्होंने अपना अस्तित्व बचाए रखा है, किन्तु केवल बचे रहना अर्थहीन है | निश्चित रूप से वे अत्यंत निम्न और स्वार्थपूर्ण धरातल पर रहे हैं | मैं निश्चय पूर्वक मानता हूँ कि ग्राम प्रजातंत्र देश के लिए विनाशकारी है | इसलिए प्रांतवाद और साम्प्रदायिकता की आलोचना करने वाले लोग जब ग्रामीण प्रदेशों के प्रबल समर्थक बनकर सामने आते हैं तो मुझे आश्चर्य होता है | कूपमंडूकता, अज्ञान, संकुचित मानस और साम्प्रदायिकता को छोड़कर गाँव की दूसरी पहचान क्या है ? मुझे इस बात की खुशी है कि संविधान की पांडुलिपी में गाँव शब्द को छोड़ दिया गया है और व्यक्ति को इकाई माना गया है |

स्वाभाविक ही डॉ. अम्बेडकर के इस बयान का तीखा विरोध हुआ | संयुक्त प्रान्त के श्री दामोदर स्वरुप शेठ, प्रा.शिब्बनलाल सक्सेना, मध्य प्रांत एवं वराड के श्री एच.वी. कामत, डॉ. पी.एस. देशमुख, श्री आर. के. सिधवा, उडीसा के श्री लोकनाथ मिश्र, प. बंगाल के श्री अरुण चन्द्र गुहा, मद्रास के श्री टी. प्रकाशम्, श्री के. संतानम, श्री अलादी कृष्णस्वामी आयंगर, प्रो. एन.जी. रंगा तथा अन्य प्रमुख लोगों ने एक स्वर से डॉ. आंबेडकर द्वारा ग्राम समाज के प्रति प्रदर्शित अनादर की आलोचना की |
श्री एच. वी. कामत ने कहा कि ग्रामीण प्रजा के प्रति यदि हमारा रवैया ऐसा ही रहने वाला है तो हमें भगवान ही बचा सकता है | मेरी समझ में नहीं आता कि गाँव एवं ग्रामीण प्रजा के प्रति सहानुभूति, स्नेह और सद्भाव के बिना देश का पुनरुत्थान कैसे हो सकेगा ? ....डॉ. अम्बेडकर ने जिस प्रकार अप्रिय शब्दों में गाँवों के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसे सुनकर मुझे अपार दुःख हुआ है | मूलतः दोष कदाचित प्रारूप में ही है | श्रीमान मुंशी के एक अपवाद को छोड़कर समिति के किसी सदस्य की स्वतन्त्रता की लड़ाई में कृतिशील सहभागिता नहीं रही है | इसलिए आन्दोलन की भावना, हमें प्रेरित करने वाली प्रबलता उनमें से कोई समझ नहीं पायेगा | .... वास्तव में इस समस्या के समाधान के लिए सोचना होगा कि क्या व्यक्ति राज्य के लिए है या राज्य व्यक्ति के लिए ? महात्मा गांधी अपने जीवनकाल में इस द्वंद्व का सम्यक समाधान ढूँढने के लिए जूझे और अंततोगत्वा पंचायत राज्य की संकल्पना प्रस्फुटित हुई | मुझे आशा है, हम उस दिशा की ओर आगे बढ़ेंगे जिसके अंतर्गत राज्य का अस्तित्व व्यक्ति के लिए हो, व्यक्ति का अस्तित्व राज्य के लिए कदापि नहीं |
श्री लोकनाथ मिश्र ने कहा कि मुझे आश्चर्य इस बात का है कि डॉ. अम्बेडकर जैसा विद्वान् व्यक्ति भी भारत के विषय में सीमित जानकारी रखता है | वे संविधान के प्रारूप की आत्मा हैं पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस प्रारूप में उन्होंने जो प्रस्तुत किया है वह पूर्णतः अभारतीय है | यह प्रारूप पश्चिम की ऐसी नक़ल है जिसे केवल दासता का प्रतिज्ञापत्र ही कहा जाएगा | अरे इससे भी बढ़कर यह पश्चिम के चरणों में शरणागति के समान है |
प्रो. एन. जी. रंगा ने स्पष्टता से कहा कि विगत एक हजार वर्षों में दक्षिण भारत की ग्राम पंचायतों ने जो उपलब्धियां प्राप्त की हैं, उसकी जानकारी यदि डॉ. आंबेडकर को होती तो वे ऐसा नहीं कहते | अन्य देशों के इतिहास का जितनी गहराई से उन्होंने अध्ययन किया, उतनी रूचि यदि भारतीय इतिहास के अध्ययन के प्रति दर्शाते तो इस प्रकार से प्रतिपादित करने की उन्हें आवश्यकता ही नहीं रहती |
श्री महावीर त्यागी ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर द्वारा गाँवों के विरुद्ध किये गए विधानों के सामने अपना विरोध प्रगट किये बिना मैं अपने लोगों के सामने जाकर खडा नहीं रह पाउँगा | डॉ. अम्बेडकर को ज्ञात ही नहीं है कि स्वतंत्रता के आन्दोलन में गाँवों ने कितना बलिदान दिया है ? मेरा प्रस्ताव है कि गाँवों के लोगों को प्रशासन में अपना उचित भाग मिलना चाहिए |
इतने उग्र प्रतिरोध के बाद 22 नवम्बर 1948 को संविधान में धारा 40 का समावेश हुआ तथा ग्राम पंचायतों के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ | 
(लेख का आधार -पंचायत राज एवं भारतीय राजनीतितंत्र लेखक प्रख्यात गांधीवादी विचारक स्व. श्री धर्मपाल)

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