आज 22 जनवरी है | अमर शहीद रोशन सिंह जी का जन्म दिन | मन में एक सवाल उठा कि क्या देश की नई पीढी रोशन सिंह को जानती है ? जानना तो दूर की बात, क्या उन्होंने कभी उनका नाम भी सुना है ? तो इच्छा हुई कि आज मैं रोशन सिंह जी को सादर कुछ शब्द पुष्प समर्पित करूँ |
क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तरप्रदेश के ख्यातिप्राप्त जनपद शाहजहांपुर  के गांव नबादा में 22 जनवरी 1892 को हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था असहयोग आन्दोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में हुए गोली-काण्ड में सजा काटकर जैसे ही शान्तिपूर्ण जीवन बिताने घर वापस आये कि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन में शामिल हो गये। नौ अगस्त 1925 को उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाना लूटने के आरोप में उन्हें पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्ला खां के साथ १९ दिसम्बर १९२७ को फांसी दे दी गयी। ठाकुर साहब आयु की द्रष्टि से सबसे बडे, अनुभवी, दक्ष व अचूक निशानेबाज थे।

ठाकुर रोशन सिंह ने छह दिसंबर 1927 को इलाहाबाद नैनी जेल की काल कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था..

एक सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी।

दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है।

दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूं। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्टभरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी जीने के लिए जा रहा हूं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की...।

पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अंत में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा...

'..जिंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन
..वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं..।'

जब उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई तो उन्होंने ॐ का उच्चारण किया | अंतिम समय में भी वेद मन्त्रों पाठ करते हुए फांसी के फंदे को चूमकर वन्दे मातरम का उद्घोष करते हुए उन्होंने मृत्यु का वरन किया

इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध एकत्र थे उनके अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए एकत्रित थे । गंगा-यमुना के संगम तट पर वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।  मूंछें वैसी की वैसी ही थीं बल्कि गर्व से ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थी। उन्हें मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फांसी दे दी गई, कोई बात नहीं। उन्होंने तो जिंदगी का सारा सुख उठा लिया परंतु बिस्मिल, अशफाक और लाहिडी़ जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा, उन्हें इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फांसी पर क्यों लटकाया ?

अमर बिस्मिल रोशन लाहिरी,

अमर आजाद प्रतापी आज |

अंग्रेज हुए थे कम्पित जिनसे,

छोड़ भगे थे तख्तो ताज |

लेकिन सच में पूर्ण हुआ क्या,

जो था उनका सपना ?

बियावान जंगल सा लगता,

नंदन कानन अपना |

जब भी सरफ़रोश बनने के,

भाव मनों में जागेंगे |

सच्चे श्रद्धा सुमन शहीदों,

को अर्पित कहलायेंगे |

प्रेम सलिल से धरा भिगो दें,

भारत माता की जय हो |

यह संभव तब ही हो पाए,

स्वार्थ भाव का जब क्षय हो | 

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